मौत का वार्मर: छिंदवाड़ा जिला अस्पताल की घोर लापरवाही, सिस्टम की आग में झुलसे तीन मासूम !
सफेद हाथी बन चुके मेडिकल कॉलेज और कुंभकर्णी नींद में सोए जिला प्रशासन के मुंह पर तमाचा है यह घटना
सिस्टम की नाकामी, भ्रष्टाचार और अस्पताल प्रबंधन की शर्मनाक लापरवाही ने एक बार फिर छिंदवाड़ा के स्वास्थ्य महकमे के मुंह पर कालिख पोत दी है। जिन नवजातों ने अभी दुनिया में ठीक से आंखें भी नहीं खोली थीं, उन्हें जीवन देने वाले जिला अस्पताल के नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाई (NICU) ने मौत की भट्टी में धकेल दिया। शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात 2 बजे वार्मर मशीन में भड़की आग कोई महज ‘तकनीकी खराबी’ नहीं, बल्कि कुप्रबंधन और निकम्मेपन का वह जीता-जागता सबूत है, जिसने तीन मासूमों की जान को दांव पर लगा दिया।
✍️ राकेश प्रजापति
‘जीवन रक्षक’ मशीनों के नाम पर चल रहा ‘मौत का जुगाड़’ जानकारी के मुताबिक, जन्म के बाद शरीर का तापमान सामान्य रखने के लिए बच्चों को वार्मर में रखा गया था। लेकिन मेंटेनेंस के अभाव में कबाड़ हो चुकी इन मशीनों की हीटिंग यूनिट के फिलामेंट में स्पार्किंग हुई और आग लग गई। सवाल यह है कि मशीनों के रखरखाव के नाम पर हर साल जो लाखों रुपये का बजट फूंका जाता है, वह किसकी जेब में जा रहा है ? यह आग शॉर्ट सर्किट से नहीं, बल्कि उस भ्रष्टाचार की चिंगारी से लगी है, जिसकी आंच में आज ये तीन नवजात झुलस गए।
मेडिकल कॉलेज का खोखला दावा और रेफरल का शर्मनाक खेल हादसे के बाद अस्पताल में मची अफरा-तफरी के बीच प्रबंधन ने अपनी नाकामी छिपाने का सबसे आसान और चिर-परिचित रास्ता चुना— ‘रेफरल’। करोड़ों की लागत से छिंदवाड़ा में मेडिकल कॉलेज का बोर्ड तो टांग दिया गया है, लेकिन इसकी हकीकत बेहद खोखली और डरावनी है। तीनों बच्चों को रातों-रात जबलपुर मेडिकल कॉलेज के लिए पार्सल कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब पता चला कि गंभीर रूप से झुलसे एक बच्चे को सर्जरी की जरूरत है और इतने बड़े ‘मेडिकल कॉलेज’ में एक पीडियाट्रिक सर्जन (शिशु शल्य चिकित्सक) तक मयस्सर नहीं है!
अगर हर गंभीर मरीज को जबलपुर ही खदेड़ना है, तो छिंदवाड़ा में इस सफेद हाथी (मेडिकल कॉलेज) को पालने का क्या औचित्य है ? यहां के डॉक्टर केवल पन्ना पलटने और मरीजों को रेफर करने के लिए बैठे हैं ?
कहाँ है जिला प्रशासन ? आम जनता की जिंदगी की कोई कीमत नहीं ? यह कोई इकलौता मामला नहीं है। छिंदवाड़ा जिला अस्पताल में आए दिन अव्यवस्थाओं का अंबार लगा रहता है। गरीब मरीज ओपीडी से लेकर वार्डों तक दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। दवाइयों की कमी, डॉक्टरों की नदारदगी और स्टाफ की बदसलूकी यहां का रोजमर्रा का नियम बन चुका है। लेकिन वातानुकूलित कमरों में बैठे जिला प्रशासन के आला अफसर और स्वास्थ्य विभाग के हुक्मरान अपनी कुंभकर्णी नींद में मस्त हैं। जनता की तकलीफों से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। मरीज यहां इलाज के लिए नहीं, बल्कि अपनी जान भगवान भरोसे छोड़कर आने को मजबूर हैं।
‘जांच’ के नाम पर लीपापोती की पटकथा तैयार अब हमेशा की तरह बेशर्म अस्पताल प्रबंधन ने अपनी खाल बचाने के लिए ‘जांच’ का रटा-रटाया झुनझुना थमा दिया है। तकनीकी खराबी का बहाना बनाकर असल दोषियों—जिम्मेदार अधिकारियों और मेंटेनेंस एजेंसी—को बचाने की पटकथा लिखी जा चुकी है।
प्रशासन कान खोलकर सुन ले, अगर इन मासूम बच्चों की जान पर कोई भी बन आई, तो इसका जिम्मेदार सिर्फ वार्मर का फिलामेंट नहीं होगा, बल्कि पूरा का पूरा भ्रष्ट स्वास्थ्य तंत्र और आंखें मूंदे बैठा जिला प्रशासन होगा। समय आ गया है कि इस लापरवाही पर सिर्फ कागजी नोटिस नहीं, बल्कि सीधे तौर पर गैर-इरादतन हत्या के प्रयास की एफआईआर दर्ज कर जिम्मेदार अधिकारियों को जेल की सलाखों के पीछे डाला जाए !