कागजों में सिमटा वन्य प्राणी संरक्षण सप्ताह, वनवृत्त में तैयारियां नदारद ..

वन, वन्यप्राणी और पर्यावरण के प्रति समाज में, विशेषकर आगामी पीढ़ी में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में देशभर में वन्य प्राणी संरक्षण सप्ताह मनाया जाता है। इस दौरान स्कूल-कॉलेजों में चित्रकला, निबंध, वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताएं, वन भ्रमण, सेमिनार, पौधरोपण और जागरूकता रैलियों जैसे कार्यक्रमों की परंपरा रही है। लेकिन वन संपदा से समृद्ध छिंदवाड़ा जिले में इस बार भी यह महत्वपूर्ण आयोजन महज औपचारिकता बनकर रह जाने के आसार सौ फीसदी हैं। वन महकमे की तैयारियों की हकीकत यह है कि सप्ताह शुरू हुए दो दिनों बीत गए हैं, फिर भी जिला मुख्यालय स्तर पर न कोई कार्ययोजना जारी हुई है, न स्कूलों और सामाजिक संगठनों से कोई संवाद स्थापित किया गया है।

जिले की कमान संभाल रहे अधिकारियों को अपने वातानुकूलित कक्षों से बाहर निकलने की फुर्सत नहीं है, तो मैदानी अमला भी निष्क्रियता की चादर ओढ़े हुए है। जिन कंधों पर जंगलों और वन्यप्राणियों की सुरक्षा के साथ-साथ जनजागरूकता की जिम्मेदारी है, वही इस अभियान से बेखबर बने हुए हैं। इसका खामियाजा उन बच्चों और युवाओं को भुगतना पड़ेगा, जिनके भीतर प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता पैदा करना इस सप्ताह का मूल उद्देश्य है।

इस संबंध में जब पश्चिम वनमण्डलाधिकारी साहिल गर्ग से बात की गई तो उन्होंने बताया कि इस बार रेंज स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करने के लिए रेंज अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं। रेंज अधिकारी अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि सप्ताह के अंतिम दिन सर्किल स्तर पर जिला मुख्यालय में समापन कार्यक्रम आयोजित करने पर विचार किया जा रहा है।

ज्ञात हो कि छिंदवाड़ा जिला वन और वन्यप्राणियों की दृष्टि से मध्यप्रदेश के समृद्धतम जिलों में गिना जाता है। तामिया,दिलाखारी,झिरपा, जुन्नारदेव, अमरवाड़ा, हर्रई और बिछुआ के घने जंगलों में बाघ, तेंदुए, भालू सहित अनेक दुर्लभ वन्यप्राणियों की मौजूदगी है। बीते अगस्त-सितंबर माह में हाथी के विचरण से मानव-वन्यजीव द्वंद्व की घटनाओं ने पूरे जिले को दहला दिया था। ग्रामीण क्षेत्रों में दहशत का माहौल था और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे थे। ऐसे संवेदनशील समय में संरक्षण सप्ताह के माध्यम से ग्रामीणों को वन्यप्राणियों के व्यवहार, सुरक्षा के उपायों और सह-अस्तित्व के प्रति जागरूक करना अत्यंत आवश्यक था, लेकिन विभागीय उदासीनता इस अवसर को भी गंवाती दिख रही है।

पर्यावरणविदों और वन्यजीव प्रेमियों का स्पष्ट कहना है कि बीते दो सालों से पश्चिम वनमंडलाधिकारी इस आयोजन को लेकर कोई रुचि नहीं ले रहे है इस मामले में जागरूक, प्रगतिशील विचारधारा और मिडिया से दूरी बनाए रखते है , केवल रेंज स्तर पर खानापूर्ति करके और अंतिम दिन एक औपचारिक समापन कार्यक्रम कर इस सप्ताह के उद्देश्य को पूरा नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि सप्ताह भर जिला मुख्यालय सहित सभी रेंजों में सुनियोजित, सार्थक और प्रभावी गतिविधियां संचालित हों। स्कूली बच्चों को वनों का भ्रमण कराया जाए, विशेषज्ञों के व्याख्यान हों और मानव-वन्यजीव द्वंद्व को कम करने पर खुला संवाद हो। यदि रक्षक ही उदासीन रहेंगे तो संरक्षण का संदेश जन-जन तक कौन पहुंचाएगा, यह बड़ा सवाल है।,