कुकड़ीखापा में मौत से जंग : 150 फीट नीचे, गरजते झरने के बीच चार जिंदगियां !

 कुकड़ीखापा में मौत से जंग : 150 फीट नीचे, गरजते झरने के बीच चार जिंदगियां !

छिंदवाड़ा // कुकड़ीखापा का वो झरना… जिसे मानसून में देखने दूर-दूर से लोग आते हैं, रविवार को काल बन गया। 150 फीट ऊंचाई से दहाड़ता पानी, चारों तरफ धुंध और उस धुंध के बीच एक चट्टान पर सिकुड़ी बैठी चार जिंदगियां। नीचे मौत का शोर, ऊपर जिंदा बचने की आखिरी उम्मीद।

सेल्फी का शौक और अचानक आया सैलाब

नागपुर से आए चार दोस्त – श्याम बोरकर (25), अथर्व ओके (22), मनीष उइके (25) और सतीश बावने (23) शहर की भीड़ से दूर, कुकड़ीखापा की खूबसूरती को कैमरे में कैद करने आए थे। घूमते-घूमते जोश जोश में वे पानी के बीचों-बीच निकली चट्टानों तक उतर गए। रील बन रही थी, फोटो खिंच रहे थे। और तभी… ऊपर पहाड़ी पर हुई बारिश ने रंग दिखाया।

किसी को कुछ समझ आता, उससे पहले ही जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा। देखते ही देखते वापसी का पथरीला रास्ता पानी में डूब गया। बहाव इतना तेज कि एक कदम आगे रखना मतलब सीधे मौत के मुंह में जाना। चारों दौड़कर एक ऊंची चट्टान पर चढ़ गए। अब चारों तरफ सिर्फ पानी था। ऊपर से 150 फीट से गिरता झरना सीधे उनके सिर पर, और नीचे उफनता गहरा कुंड। वे पिछले डेढ़ घंटे से वहीं फंसे थे। चिल्ला भी नहीं पा रहे थे, क्योंकि झरने की गर्जना में उनकी आवाज दब रही थी।

किनारे खड़े लोगों की सांसें अटकीं

किनारे पर खड़े दूसरे पर्यटकों ने जब उन्हें फंसा देखा तो होश उड़ गए। किसी ने हिम्मत कर डायल-112 पर फोन लगाया। सूचना मिलते ही मोहखेड़ थाना और उमरानाला चौकी प्रभारी राजेश साहू अपनी टीम के साथ दौड़ते हुए पहुंचे। लेकिन नजारा देखकर पुलिस भी सन्न रह गई। तेज बहाव में बिना उपकरण के नीचे उतरना आत्महत्या था। तुरंत वायरलेस गूंजा – “स्टेट कमांड सेंटर और कंट्रोल रूम को इन्फॉर्म करो, SDERF चाहिए!”

150 फीट नीचे उतरी जिंदगी की डोर

डिस्ट्रिक्ट कमांडेंट स्नेहलता पाठ्या के एक निर्देश पर SDERF की स्पेशल टीम रवाना हुई। कंपनी कमांडर गणेश कुमार धुर्वे के नेतृत्व में जवान रस्सियों, हार्नेस, हेलमेट और लाइफ जैकेट के साथ मौके पर पहुंचे। पहले एक जवान ने रस्सी के सहारे खुद को 150 फीट गहरी खाई में उतारा। एक हाथ में रस्सी, दूसरे में सहारा, पैरों के नीचे फिसलन भरी चट्टानें और सामने मौत की तरह गिरता पानी। एक-एक इंच नीचे उतरना किसी जंग से कम नहीं था। नीचे पहुंचकर जवानों ने पहले चारों युवकों को हिम्मत बंधाई। उन्हें सुरक्षा बेल्ट पहनाई। फिर एक-एक करके, रस्सी के सहारे ऊपर खींचा गया।

नीचे चट्टान पर बैठा हर युवक थर-थर कांप रहा था। डेढ़ घंटे तक मौत को इतने करीब से देखने के बाद जब पहला युवक ऊपर आया, तो किनारे खड़े लोगों ने तालियों से उसका स्वागत किया। करीब एक घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद चारों को सकुशल बाहर निकाल लिया गया।

बाहर आते ही चारों युवक जवानों के पैरों से लिपट गए। आंखों में आंसू थे, और जुबान पर सिर्फ एक ही शब्द – शुक्रिया।

इस पूरे रेस्क्यू को सफल बनाने वाले हीरो रहे – सैनिक राजा मर्सकोले, स्पर्श यादव, प्रवीण धुर्वे, सुमित शर्मा, दीपेंद्र बरकडे, अजय धुर्वे और सचिन विश्वकर्मा।

मानसून में झरना खूबसूरत जरूर लगता है, लेकिन उसका मिजाज पल भर में बदल जाता है। एक सेल्फी के लिए जिंदगी दांव पर लगाना समझदारी नहीं है।