अंततः दीदार दे ही दिया गजराज ने: रात भर की यात्रा कर पहुंचा तामिया के बिजोरी, पहली तस्वीर ने खत्म किया 6 दिन का रहस्य
छिंदवाड़ा/तामिया: आखिरकार छिंदवाड़ा के जंगलों का रहस्यमय मेहमान मान ही गया। छह दिनों से वीट, पदचिन्हों और अफवाहों के साये में घूम रहे विशालकाय जंगली हाथी ने रात भर की लंबी यात्रा कर तामिया विकासखंड के बिजोरी के घने वन में अपने दीदार करा ही दिए। सुबह-सुबह जब उसकी पहली तस्वीर और वीडियो सामने आया, तो मानो पूरे वन विभाग और ग्रामीणों की थकी हुई आंखों को सुकून मिल गया।
राकेश प्रजापति
लगता है जैसे कान्हा के हरे-भरे कैनवास से बिछड़ा यह एकाकी यात्री, छिंदवाड़ा के सुदूर वनांचलों की सुंदरता को निहारने निकला है। सिवनी की सीमा लांघ, चौरई-अमरवाड़ा-परासिया के जंगलों को चूमता हुआ, यह गजराज अब सतपुड़ा की गोद में बसे तामिया के बिजोरी तक पहुंच गया है। यह कोई हमला नहीं, यह प्रकृति का एक मौन संदेश है।
पिछले 6 दिनों से वन विभाग की तीन टीमें, ड्रोन कैमरे और सैकड़ों ग्रामीण इस उम्मीद में जंगल की खाक छान रहे थे कि कहीं तो गजराज दिखे। ड्रोन भी जिसे नहीं देख पाया था, उसने आज स्वयं दर्शन देकर जैसे सबकी मेहनत पर तरस खा लिया। अब यह स्पष्ट हो गया है कि यह कोई कहानी नहीं, बल्कि हमारे समृद्ध जैव-विविधता वाले जंगलों में एक नए अतिथि का आगमन है।
पर्यावरणीय दृष्टि से यह घटना बेहद महत्वपूर्ण है। यह हाथी हमें याद दिला रहा है कि कान्हा-पेंच-सतपुड़ा का प्राचीन एलिफेंट कॉरिडोर आज भी जीवित है। जंगल कहीं से भी कटे नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हैं। यह विशालकाय जीव उसी हरित गलियारे के रास्ते अपना पुराना घर ढूंढ रहा है।
वन विभाग के लिए अब चुनौती और भी बढ़ गई है। पूर्व वनमंडल डीएफओ स्वरूप दीक्षित पहले ही अपील कर चुके हैं – “हीरो बनने की कोशिश न करें”। यह समय उत्सव का नहीं, बल्कि संयम और सह-अस्तित्व का है। हाथी को न घेरें, न उकसाएं, न उसके करीब जाकर सेल्फी का प्रयास करें। उसे शांतिपूर्वक अपना रास्ता तय करने दें।
तामिया का बिजोरी वनक्षेत्र हाथी के लिए अनुकूल है, यहां पानी और भोजन प्रचुर मात्रा में है। वन विभाग को चाहिए कि उसे सुरक्षित रूप से वापस कान्हा-पेंच लैंडस्केप की ओर मोड़ा जाए, ताकि यह एकाकी सफर किसी मानव-वन्यजीव द्वंद्व में न बदल जाए। अनुभवी वनाधिकारी ने संभावना व्यक्त की है कि हाथी या तो बिजौरी से तामिया या फिर जुन्नारदेव की तरफ भी मुड सकता है , वैसे गजराज बिजौरी से ग्राम इटावा की और बड रहा है
पहली तस्वीर ने हमारी जिज्ञासा शांत जरूर की है, लेकिन एक बड़ा सवाल छोड़ गई है – क्या हम अपने जंगलों को इतना सुरक्षित और जुड़ा हुआ रख पाएंगे कि भविष्य में ऐसे गजराज मेहमान नहीं, बल्कि स्थायी निवासी बनकर लौट सकें ?