भटका गजराज और सिस्टम का अंधेरा : 70 साल के किसान का काल बना हाथी, 5 दिन से गांवों में ब्लैकआउट
यह सिर्फ एक हाथी के हमले की खबर नहीं है, यह सतपुड़ा के पारिस्थितिक तंत्र के टूटने और वन विभाग के निकम्मेपन की जीती-जागती दास्तां है। कान्हा के घने जंगलों से अपने झुंड से बिछड़ा एक विशालकाय गजराज, अपना प्राचीन एलीफेंट कॉरिडोर तलाशते हुए सिवनी से छिंदवाड़ा में दाखिल हुआ। चौरई, अमरवाड़ा, परासिया के जंगलों को रौंदता हुआ वह अब तामिया-देलाखारी के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की सीमा पर पहुंच गया था ..
करीब 100 किलोमीटर की इस रोमांचक और खतरनाक यात्रा में वह तीन बार इंसानों से टकरा चुका है।
इसके पहले हमले में अमरवाड़ा के चिखली चनेरी में सुरेश कुमरे और तामिया के बीजाढाना में 60 वर्षीय चतुर्सी शीलू इस गजराज की चपेट में आ चुके हैं और अब तीसरा – देलाखारी रेंज के बम्हनी गांव का 70 वर्षीय रामप्रसाद कहार। ग्रामीणों के मुताबिक कल देर रात बम्हनी से चावलपानी मार्ग पर खेत से लौट रहे 70 वर्षीय रामप्रसाद कहार पर हाथी ने अचानक अटैक कर दिया। हमले में बुजुर्ग गंभीर रूप से घायल हो गया। सूचना पर पहुंचे निचले अमले ने घायल को अस्पताल पहुंचाया, जहां उसका उपचार जारी है। घायल बुजुर्ग का कान आधा लटक गया है , पसली ओर कमर में गहरी चोट बताई जा रही है ।
वन्य प्राणी विशेषज्ञों की मानें तो हाथी हमलावर नहीं है, वह भटका हुआ है। वह प्यास, भूख और अपने झुंड से बिछड़ने की पीड़ा में है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व, कान्हा-पेंच लैंडस्केप का यह जुड़ा हुआ वन क्षेत्र उसका हजारों साल पुराना घर है। मानव अतिक्रमण और कॉरिडोर बंद होने से वह गांवों की ओर धकेला जा रहा है।
लेकिन इस पूरे पारिस्थितिक संकट में सबसे बड़ा विलेन वन विभाग की लचर व्यवस्था बन गई है। 6 दिन से हाथी जिले में है। विभाग ने उसे ट्रैक करने के लिए ड्रोन उड़ाया, पर ड्रोन भी उसे नहीं देख पाया। मैदानी अमले ने उसे आंखों से नहीं देखा। तलाश सिर्फ उसकी वीट (गोबर) और पदचिन्हों के सहारे हो रही है।
और समाधान के नाम पर विभाग ने जो किया वह और भी खतरनाक है – जहां-जहां से हाथी गुजर सकता है, वहां की बिजली सप्लाई रात में बंद कर दी जा रही है। पिछले 5 दिनों से बम्हनी-चावलपानी क्षेत्र में ब्लैकआउट है। यानी ग्रामीण पहले हाथी की दहशत में, ऊपर से अंधेरे में रहने को मजबूर।
ग्रामीण हादसों का शिकार हो रहे हैं क्योंकि उन्हें न तो समय पर सूचना मिल रही है, न सुरक्षा। आलाधिकारी AC कमरों में बैठकर सिर्फ फाइलों में लोकेशन ले रहे हैं। पश्चिम वनमंडल के DFO साहिल गर्ग फोन पर भी उपलब्ध नहीं हैं। मैदान पर कोई बड़ा अधिकारी नजर नहीं आ रहा, गश्त के नाम पर दो-चार वनरक्षक लाठियों के सहारे जंगल नाप रहे हैं।
यदि गजराज को जल्द ही सुरक्षित रूप से उसके कॉरिडोर की ओर नहीं मोड़ा गया, तो यह मानव-वन्यजीव संघर्ष और खूनी हो सकता है। सवाल हाथी का नहीं, सिस्टम के सोए रहने का है।
तीन हमलों के बाद भी यदि आलाधिकारी AC कमरों में बैठकर रिपोर्ट लेंगे और फोन बंद कर लेंगे, तो चौथा हादसा होने से कौन रोकेगा ?