खेतों में भीषण सूखा, वहीँ कांग्रेस के आंगन में ‘घर वापसी’ का प्री-मानसून..

छिंदवाड़ा का सियासी मौसम: खेतों में भीषण सूखा, वहीँ कांग्रेस के आंगन में ‘घर वापसी’ का प्री-मानसून

प्रकृति और राजनीति का मिजाज कब बदल जाए, इसका सटीक अनुमान लगाना मुश्किल है। इन दिनों मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र में एक अजीब सा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां जिले का अन्नदाता किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए सूखे की मार झेल रहा है, खेतों की दरारें हुक्मरानों से राहत की गुहार लगा रही हैं, वहीं दूसरी ओर छिंदवाड़ा के सियासी आसमान पर अचानक मौसम बदल गया है। कांग्रेस के खेमे में ‘प्री-मानसून’ ने जोरदार दस्तक दे दी है। यह प्री-मानसून पानी का नहीं, बल्कि उन नेताओं की ‘घर वापसी’ का है, जो कुछ समय पहले सत्ता की तपिश में झुलसकर या किसी मुगालते में अपना घर छोड़ गए थे..

त्वरित टिप्पणी : राकेश प्रजापति 

जिला पंचायत उपाध्यक्ष अमित सक्सेना की कांग्रेस में वापसी, इस बदलते सियासी मौसम का पहला बड़ा संकेत है। पूर्व सांसद नकुलनाथ की मौजूदगी में अमित सक्सेना का दोबारा कांग्रेस का गमछा पहनना महज एक व्यक्ति का दल-बदल नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम की आहट है। नकुलनाथ का यह स्पष्ट संदेश कि “जिन्हें अपनी गलती का अहसास है, उन्हें ही पार्टी में लिया जाएगा,” दर्शाता है कि कांग्रेस अब पूरी तरह से ‘फिल्टर’ लगाकर अपनों को गले लगाने के मूड में है।

अमित सक्सेना का वह दर्द, जिसमें उन्होंने कहा कि “जिला सूखाग्रस्त है, लेकिन भाजपा में बोलने की आजादी नहीं है,” मौजूदा वक्त की राजनीति का सबसे बड़ा सच बयां कर रहा है। भाजपा की वर्तमान केंद्रीयकृत राजनीति, जहां आलाकमान का सख्त नियंत्रण और अनुशासन के नाम पर थोपा गया अत्यधिक दबाव है, वह अब जमीनी कार्यकर्ताओं और खासकर उन नेताओं को रास नहीं आ रहा है जिनका मूल डीएनए कांग्रेस का रहा है।

राजनीतिक पंडितों और जानकारों की भविष्यवाणियों पर गौर करें तो यह तो महज एक शुरुआत है। ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में भाजपा का दामन छोड़कर कांग्रेस के आंगन में ‘घनघोर रूप से बादल बरसेंगे’। सत्ताधारी दल में घुटन महसूस कर रहे नेताओं की एक बड़ी खेप वापसी की राह देख रही है।

छिंदवाड़ा जिसे दशकों से कमलनाथ का अभेद्य दुर्ग माना जाता रहा है, वहां पिछले चुनावों में कांग्रेस हारी या फिर राजनीतिक बिसात पर ‘हराई गई’, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन एक बात जो दिन के उजाले की तरह साफ है, वह यह कि इस जिले की मिट्टी में कांग्रेस और कमलनाथ की जड़ें इतनी गहरी हैं कि सत्ता का एक झोंका उन्हें उखाड़ नहीं सकता।

प्रदेश स्तर पर भी कांग्रेस के ‘घर वापसी अभियान’ को अब एक नई ऊर्जा मिल रही है। छिंदवाड़ा से उठी यह बयार जल्द ही समूचे मध्य प्रदेश में एक आंधी का रूप ले सकती है। जो नेता सत्ता के आकर्षण या किसी तात्कालिक दबाव में पाला बदल गए थे, वे अब अपने मूल कैडर में लौटने को छटपटा रहे हैं। भाजपा के जिला अध्यक्ष भले ही अमित सक्सेना के जाने को उनका ‘व्यक्तिगत निर्णय’ बताकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश कर रहे हों, लेकिन सच्चाई यह है कि किसानों की अनदेखी और संगठन के भीतर संवादहीनता ने एक बड़े असंतोष को जन्म दे दिया है।

छिंदवाड़ा की यह सियासी करवट सिर्फ एक जिले तक सीमित रहने वाली नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में ‘कम्फर्ट जोन’ और ‘विचारधारा का जुड़ाव’ सत्ता की मलाई से कहीं ज्यादा मायने रखता है। अब देखना यह है कि कांग्रेस का यह ‘प्री-मानसून’ आने वाले दिनों में मध्य प्रदेश की राजनीति में कितनी जोरदार ‘झमाझम बारिश’ करता है।