जनजाति कार्य विभाग में भ्रष्टाचार का तांडव, भूख और प्रताड़ना से तंग आकर हॉस्टल छोड़ भागे 11 मासूम

जनजाति कार्य विभाग में भ्रष्टाचार का तांडव: मासूम आदिवासियों के निवाले पर ‘डाका’, ‘लक्ष्मी दर्शन’ के दम पर फल-फूल रहा छात्रावासों में शोषण का खेल

दाल-सब्जी की जगह पानी जैसा खाना, अधीक्षिका के अभद्र व्यवहार और प्रताड़ना से त्रस्त 11 मासूम तड़के 4 बजे हॉस्टल छोड़कर भागे; हरदुआ माल से लेकर कलेक्ट्रेट तक मचा हड़कंप

आदिवासी उत्थान और कल्याण के नाम पर करोड़ों के बजट का ढिंढोरा पीटने वाले जनजाति कार्य विभाग का असली और घिनौना चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया है। विभाग में आलम यह है कि बिना ‘लक्ष्मी दर्शन’ (मोटी रिश्वत) के एक पत्ता तक नहीं खड़कता। मलाईदार पोस्टिंग पाने के लिए लाखों की बोली लगाने वाले हुक्मरान जब छात्रावासों और आश्रमों की कमान संभालते हैं, तो उनकी प्राथमिकता बच्चों का भविष्य नहीं बल्कि वसूली गई रकम का कई गुना मुनाफा वसूलना बन जाता है। इस भ्रष्टाचार का सीधा दंश छात्रावासों में रहने वाले गरीब, बेसहारा और मासूम आदिवासी बच्चों को अपनी भूख और आंसुओं से चुकाना पड़ रहा है।

✍️ राकेश प्रजापति 

दिल दहला देने वाला मामला छिंदवाड़ा जिले की चौरई तहसील अंतर्गत हरदुआ माल स्थित अनुसूचित जनजाति बालक छात्रावास से सामने आया है, जहाँ प्रताड़ना और भूख से तंग आकर 11 नाबालिग आदिवासी बच्चे मंगलवार तड़के 4 बजे अंधेरे में ही जान बचाकर हॉस्टल से भाग निकले।

तड़के 4 बजे अंधेरे में 5 घंटे का पैदल सफर: हॉस्टल नहीं, यातना गृह बन गई थी चारदीवारी

हॉस्टल में अधीक्षक के कथित अभद्र व्यवहार और अव्यवस्थाओं की इंतहा इस कदर थी कि मासूम बच्चे रात के सन्नाटे में हॉस्टल छोड़ने पर मजबूर हो गए। मंगलवार सुबह करीब 4 बजे निकले ये 11 बच्चे बदहवास हालत में करीब 9 बजे अपने गांव ग्रेठिया पहुंचे। सुबह-सुबह बच्चों को गांव में लाचार हालत में देख परिजनों और ग्रामीणों के होश उड़ गए। ग्रामीणों ने जब उनसे रोने का कारण पूछा, तो बच्चों ने छात्रावास के अंदर चल रहे जुल्मों-सितम और बदहाली का जो कच्चा-चिट्ठा खोला, उसे सुनकर हर संवेदनशील इंसान का खून खौल उठा।

‘सब्जी’ में रात को मिलाया पानी: दाल के नाम पर परोसा जा रहा था उबला पानी

बच्चों के बयानों ने विभाग के मीनू चार्ट की धज्जियां उड़ा दी हैं। बच्चों ने रोंगटे खड़े करने वाले खुलासे करते हुए बताया:

दाल-सब्जी नहीं, पानी का कटोरा: हॉस्टल में पौष्टिक आहार तो दूर, सब्जी और दाल के नाम पर बच्चों को सिर्फ मिर्च-मसाले का पानी परोसा जा रहा था।

15 अगस्त की शर्मनाक हकीकत: बच्चों ने बताया कि स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) की सुबह महीनों बाद उन्हें अपेक्षाकृत खाने लायक सब्जी मिली थी। लेकिन संवेदनहीनता की हद देखिए—शाम को उसी बची हुई सब्जी में पानी मिलाकर (घोल बनाकर) मासूमों की थालियों में परोस दिया गया।

अधीक्षिका का अभद्र व्यवहार: बच्चों का आरोप है कि बुनियादी सुविधाएं मांगने या पेट भरने की गुहार लगाने पर हॉस्टल अधीक्षिका द्वारा उनके साथ लगातार अभद्र व्यवहार, गाली-गलौज और मानसिक प्रताड़ना की जाती थी।

हड़कंप के बाद नोटिस का खेल, ग्रामीणों ने उठाई निष्पक्ष जांच की मांग

ग्रामीणों ने जब मामले की गंभीरता को भांपते हुए प्रशासनिक अमले को आड़े हाथों लिया, तब जाकर कुंभकर्णी नींद में सो रहे विभाग में हड़कंप मचा। ट्राइबल विभाग के सहायक आयुक्त सत्येंद्र सिंह मरकाम ने मामले की जांच के लिए मंडल/क्षेत्र संयोजक मनीष बोरकर को मौके पर भेजा।औपचारिकता निभाते हुए छात्रावास अधीक्षिका गायत्री देवी सनोडिया को कारण बताओ नोटिस जारी कर खानापूर्ति की तैयारी शुरू कर दी गई है।

हालांकि ग्रामीणों और अभिभावकों का स्पष्ट कहना है कि केवल एक नोटिस जारी करके मामले को रफा-दफा करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। ग्रामीणों ने मांग की है कि:

स्वतंत्र बयान दर्ज हों: बच्चों के बयान किसी भी विभागीय दबाव, भय या अधीक्षिका की मौजूदगी के बिना स्वतंत्र रूप से दर्ज किए जाएं।

सुरक्षा और फंड की उच्चस्तरीय जांच: हॉस्टल के राशन, मेंटेनेंस फंड, सुरक्षा व्यवस्था, अनुशासन और अधीक्षक के वित्तीय लेन-देन की निष्पक्ष जांच हो ताकि कमीशनखोरी के असली संरक्षकों के चेहरे बेनकाब हो सकें।

कब थमेगा मासूमों के पेट पर डकैती का यह संगठित खेल ?

यह कोई पहला मामला नहीं है जब जनजाति कार्य विभाग के किसी आश्रम या हॉस्टल से ऐसी शर्मनाक तस्वीर सामने आई हो। जिले भर के दर्जनों हॉस्टलों में अधीक्षकों की कथित ‘मोटी सेटिंग’ के चलते बच्चों को घटिया भोजन, गंदा पानी और फटे गद्दे नसीब हो रहे हैं, जबकि कागजों पर फाइव-स्टार सुविधाएं दिखाकर लाखों-करोड़ों के बिल पास किए जा रहे हैं।

सवाल यह उठता है कि रात के 4 बजे अगर इन 11 मासूमों के साथ अंधेरे में कोई अनहोनी या जंगली जानवर का हमला हो जाता, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता? क्या विभाग के जिम्मेदार केवल ‘नोटिस-नोटिस’ का खेल खेलते रहेंगे या फिर मासूम आदिवासियों के हक पर डाका डालने वाले इस पूरे सिंडिकेट पर कोई ठोस और सख्त कानूनी चाबुक चलेगा?

अब देखना यह है कि प्रशासन भ्रष्ट तंत्र पर कड़ा प्रहार करता है या फिर हमेशा की तरह ‘लक्ष्मी’ के प्रभाव में मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा !