शिक्षा के मंदिर में कलंक कथा: निकम्मे प्रशासन के मुंह पर तमाचा हैं 100 किलोमीटर का सफर तय कर जनसुनवाई में पहुंचे ये आदिवासी स्कूली बच्चे !
छिंदवाड़ा// प्रदेश सरकार भले ही ‘मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान’ जैसे दर्जनों खोखले अभियानों का ढिंढोरा पीट ले, लेकिन धरातल पर सच्चाई बयां करती ये तस्वीरें इस सड़े हुए सिस्टम के गाल पर एक करारा तमाचा हैं। जब निकम्मे जिला प्रशासन के आलाधिकारी वातानुकूलित कमरों में बैठकर सिर्फ ‘मीटिंग-मीटिंग’ का खेल खेल रहे हों और शिकायतों पर टालमटोली वाला रवैया अपनाए बैठे हों, तो जमीनी स्तर पर जनता को सुशासन का क्या खाक लाभ मिलने वाला है ?
आज इस गंभीर घटना ने जिले भर में शिक्षा विभाग की भूमिका पर सीधे और तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर विकासखंड शिक्षाधिकारी (BEO) सहित शिक्षा और जनजाति कार्य विभाग का भारी-भरकम अमला कुंभकर्णी नींद में क्यों सोया हुआ है ? यह कैसी व्यवस्था है कि सुदूर आदिवासी अंचल (भूरभगत क्षेत्र के बिचबहरी) के मासूम स्कूली बच्चों और ग्रामीणों को अपनी पीड़ा बयां करने के लिए 100 किलोमीटर का थका देने वाला सफर तय कर जिला मुख्यालय कलेक्ट्रेट तक आना पड़ा ? यह अधिकारियों की घोर लापरवाही और विफलता का जीता-जागता प्रमाण है।
बेशर्मी की सारी हदें पार, नैतिकता ताक पर
इस पूरे प्रकरण में उन चरित्रहीन और बेशर्म टीचरों ने अपनी नैतिकता को पूरी तरह से ताक पर रख दिया है। जिन ‘गुरुओं’ के हाथों में नौनिहालों का भविष्य गढ़ने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने शिक्षा जैसे पवित्र मंदिर को सरेआम बदनाम करने का काम किया है, इसकी जितनी भी निंदा की जाए वह कम होगी।
छात्रों और सरपंच पति द्वारा लगाए गए आरोप बेहद संगीन और व्यवस्था को शर्मसार करने वाले हैं। स्कूल में पढ़ाई के नाम पर शून्य सन्नाटा है और प्रभारी प्राचार्य एवं अतिथि शिक्षक केवल अपने मोबाइल फोन में व्यस्त रहते हैं। बेशर्मी की हद तो तब पार हो जाती है जब स्कूल की निर्धारित छुट्टी शाम 4:30 बजे होने के बावजूद, बच्चों को दोपहर 3 बजे ही भगा दिया जाता है। इसके बाद ये दोनों महाशय शाम 7 बजे तक स्कूल के एक बंद कमरे में बैठे रहते हैं और पढ़ाई के समय भी अकेले बैठकर बातें करते हैं। किसी भी छात्र को उस कमरे के पास फटकने तक की इजाजत नहीं होती।
अधिकारियों की चुप्पी और बेलगाम सिस्टम
ग्रामीण और छात्र पहले भी इन शिक्षकों की करतूतों की शिकायत उच्चाधिकारियों से कर चुके हैं, लेकिन भ्रष्ट तंत्र के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। कार्रवाई न होने पर हताश होकर 16 अगस्त को आयोजित ग्रामसभा की बैठक में भी इन शिक्षकों को हटाने का निर्णय लिया गया। वहीं, जब इस गंभीर मामले में ट्राइबल विभाग के एसी सत्येंद्र मरकाम से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने फोन तक उठाना मुनासिब नहीं समझा।
यह पूरी घटना चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि शिक्षा और जनजाति विभाग का अमला पूरी तरह से पंगु, बेलगाम और संवेदनहीन हो चुका है। यदि प्रशासन में थोड़ी भी गैरत और शर्म बाकी है, तो शिक्षा के मंदिर को कलंकित करने वाले ऐसे दागी शिक्षकों पर तत्काल प्रभाव से कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए, अन्यथा यह तथाकथित ‘जन विश्वास’ धरातल पर ‘जन आक्रोश’ में बदलते देर नहीं लगेगी।