‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..24

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।

उन्ही द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की दूसरी कड़ी 24 वी कड़ी  ..

द्वितीयोऽध्यायः – ‘सांख्य-योग’

             ‘सांख्य सिद्धान्त और योग का अभ्यास’

श्लोक (४२,४३,४४)

आधार वेद का लेकर वे, यों तो चुनते हैं कर्म मार्ग,

पर फल के लालच में पड़कर, तज देते हैं अपना सुमार्ग ।

कहते हैं पाकर जन्म यहाँ, सुख पाना है तो यज्ञ करो,

कुछ रीति नीति का पालन कर, सुख स्वर्गलोक का भोग करो ।

 

समझाते रहते वेदरता, सुख स्वर्ग समान नहीं जग में,

भोगेच्छा की आसक्ति मात्र, दुर्बुद्धि भर रहे यों मन में ।

कितने विधि पूर्वक अनुष्ठान, हो रहे मगर सारे सकाम,

धार्मिक आयोजन कुशल दक्ष, कितने विशाल, कितने महान ।

 

सब लिये स्वर्ग-सुख की इच्छा, बस धर्माचार निभाते हैं,

भूले रहते उस ईश्वर को, जो हव्य यज्ञ का पाते हैं

यह भूल उपेक्षा भोक्ता की, विपरीत असर दिखलाती है,

बनने पाती है बात नहीं, अटकी भटकी रह जाती है ।

 

जैसे कपूर एकत्रित कर फिर उसमें आग लगा दें हम,

अथवा विष मिला मिठाई में, जहरीला उसे बना दें हम ।

या कुम्भ सुधा का पा जायें, पर पैर मारकर लुढ़का दें,

जो बड़ी लालसायें लेकर हम, अपने धार्मिक कृत्य करें ।

 

जब पुण्य किया सम्पादित तो, क्यों सुख की इच्छा की जाये?

क्या सुख की चाह जहां रहती, दुख साथ नहीं उसके आये?

पर नहीं समझते अज्ञानी, क्या उचित रहा, क्या अनुचित है?

ज्यों विनिमय में ही व्यापारी, बस देख रहा अपना हित है।

 

आसक्ति भोग में उपजाकर, चिन्तन कर, तन्मय हो जाते,

मनुषत्व भूल जाते अपना, बस स्वर्ग प्राप्ति में खो जाते ।

तात्पर्य वेद का सही नहीं, हो पाता ज्ञात उन्हें अर्जुन,

बस मीठी पुष्पित वाणी से, भोले चित्तों का हुआ हरण ।

 

मन सदा बना रहता चंचल, बस स्वार्थ परायणता जगती,

रे बुद्धि निश्चयात्मिका नहीं, इन विषयी पुरुषों की सधती ।

 

इसलिए पार्थ यह याद रखो, घुस गया वेद में अर्थवाद,

वह धर्म, धर्म हो सकता क्या, केवल कुबुद्धि का जहां नाद ।

बदले में चाहें सुखोपभोग, अविचार रहा यह दुखदायी,

तल दीख नहीं पाता जल का, जिसके ऊपर काई छाई । श्लोक (४५) क्रमशः…