सेल्फी की कीमत बनी जान…
झिंगरिया झरना हादसा: सेल्फी लेते समय पर्यटक बह गया, सुरक्षा में चूक उजागर
सुरक्षा रहित पर्यटन स्थलों ने फिर ली एक ज़िंदगी , झिंगरिया वाटरफॉल में युवक लापता, तलाश जारी **
राकेश प्रजापति
छिंदवाड़ा जिले के खूबसूरत लेकिन असुरक्षित पर्यटन स्थलों में एक बार फिर हादसे ने जान ले ली। दिल दहला देने वाली घटना रविवार को तामिया के नजदीक जिंगरिया वाटरफॉल में सामने आई, जहाँ गाजियाबाद निवासी मुकुंद शर्मा अचानक पानी की तेज़ धारा में बहकर लापता हो गए। परिवार पिकनिक मनाने आया था, लेकिन पलक झपकते ही खुशियों का माहौल मातम में बदल गया।
वन विभाग की घोर लापरवाही का नतीजा—सुरक्षा के नाम पर शून्य व्यवस्था
झिंगरिया वाटरफॉल सहित जिले के अधिकांश प्राकृतिक पर्यटन स्थलों पर — न तो सुरक्षा गार्ड , न चेतावनी बोर्ड , न बैरिकेडिंग , न रेस्क्यू टीम की तैनाती , न प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था इन सबकी अनुपस्थिति वर्षों से हादसों को दावत दे रही है।
स्थानीय लोगों का दर्द आज छलक उठा— “वन विभाग सिर्फ फाइलों में सक्रिय है, जमीन पर नहीं।”
हैरानी की बात यह है कि जिंगरिया क्षेत्र में पहले भी दुर्घटनाएँ हुई हैं, फिर भी विभाग ने कोई स्थायी सुरक्षा व्यवस्था नहीं बनाई। वाटरफॉल किनारों पर फिसलन इतनी अधिक है कि सामान्य पकड़ भी नहीं बन पाती, फिर भी खतरे की कोई चेतावनी तक नहीं लगाई गई।
सेल्फी लेते समय फिसला पैर… परिवार के सामने गुम हुआ युवक
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मुकुंद शर्मा रविवार दोपहर परिवार के साथ फोटो खिंचवा रहे थे। इसी दौरान उनका पैर फिसला और वे तेज़ पानी के बहाव में गिर पड़े। देखते ही देखते वे गहरे पानी में समा गए।
तुरंत स्थानीय लोगों ने आवाज़ लगाई, पर जगह इतनी दुर्गम कि बचाव संभव नहीं हो सका।
NDRF, पुलिस व वन विभाग की टीम खोज में जुटी, पर सफलता नहीं
रविवार शाम से लगातार— NDRF , पुलिस , वन विभाग की टीम तलाश में जुटी है, लेकिन भारी जलप्रवाह और गहराई के कारण रेस्क्यू अभियान बेहद मुश्किल हो गया है।
सोमवार सुबह से ड्रोन स्कैनिंग, सर्च ऑपरेशन जारी है, लेकिन अब तक युवक का कोई सुराग नहीं मिल पाया।
वन विभाग के निकम्मेपन से बढ़ा खतरा : स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि जिंगरिया क्षेत्र में रोज़ाना बड़ी संख्या में सैलानी आते हैं, लेकिन
• क्षेत्र में वन विभाग की कोई सक्रिय निगरानी नहीं
• न गश्त, न चेतावनी, न नियंत्रित प्रवेश
• न ही कोई प्रशिक्षित लाइफगार्ड
यही कारण है कि हर कुछ महीनों में कोई न कोई हादसा होता है, और विभाग घटनाओं के बाद सिर्फ ‘जांच’ की घोषणा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेता है।
मर्मांतक स्थिति—दो नन्हीं बेटियों के पिता का अनिश्चित भविष्य
मुकुंद शर्मा 3 साल और 6 महीने की दो बेटियों के पिता हैं। परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है—“बस एक बार दिख जाए… शायद बच जाए…”
उनकी पत्नी और परिवार लगातार मौके पर मौजूद हैं और उम्मीद की आखिरी किरण पकड़कर बैठे हैं।
पर्यटन संभावनाओं वाले वनांचल की अनदेखी—दुर्घटनाओं की श्रृंखला जारी
अमृत काल में भी, छिंदवाड़ा और आसपास के वनांचलों में पर्यटकों के लिए — न दिशासूचक बोर्ड , न सुरक्षा मार्ग , न मार्गदर्शन केंद्र ,
न प्रशिक्षित बचाव दल
वन विभाग सिर्फ पर्यटक संख्या बढ़ाने की बात करता है लेकिन सुरक्षा-सुविधाओं पर खर्च नाममात्र करता है। नतीजा—हर साल कई परिवार उजड़ जाते हैं।
प्रश्न जो प्रशासन से पूछे जाने चाहिए :
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झिंगरिया जैसे खतरनाक स्पॉट पर सुरक्षा क्यों नहीं ?
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क्या वन विभाग घटनाओं के बाद जागेगा या और जानें जाएँगी ?
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पर्यटन बढ़ाने की बात की जाती है, तो सुविधाएँ कहाँ हैं ?
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झिंगरिया क्षेत्र को ‘रेड ज़ोन’ घोषित कर नियंत्रण क्यों नहीं किया गया ?
निष्कर्ष : झिंगरिया जैसी सुंदर जगहें छिंदवाड़ा की पहचान हैं, लेकिन सुरक्षा के बिना ये मौत का कुंड बनती जा रही हैं।
यह हादसा केवल एक परिवार का दर्द नहीं—यह पूरे तंत्र की नाकामी का कठोर प्रमाण है।
जरूरत है त्वरित कदमों की— सुरक्षा व्यवस्था , बैरिकेडिंग , गार्डों की तैनाती , चेतावनी संकेत , नियमित मॉनिटरिंग
ताकि अगला परिवार अपनी खुशियाँ खोकर मरहम की तलाश में न भटके।