‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक .. 54

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 54 वी कड़ी ..

                           पञ्चमोऽध्यायः – ‘कर्म-सन्यास योग’

श्लोक (१५)

साधक कर्मों को, कर्म फलों को,करता जो प्रभु के अर्पण,

परमेश्वर नहीं किसी के, शुभ या अशुभ कर्म को करे ग्रहण ।

अज्ञान ज्ञान को ढँके हुए,सो ऐसा समझे अज्ञानी,

मैं सृष्टा होकर भी अज हूँ,यह तथ्य समझता है ज्ञानी ।

 

वह नहीं देखना पाप पुण्य, जो उसके आसपास रहते,

रहता ही नहीं उपस्थित वह, फिर बात दूसरी क्या कहते ।

फिर भी लेकर अवतार वही, खेला करता है बना सखा,

साकार रूप लेकर भी वह है, निराकार, जो नहीं दिखा।

 

उसको सृष्टा, पोषणकर्ता, संहारक कहते अज्ञानी,

इसलिए कि उनने निराकार की छवि न समूची पहिचानी ।

श्लोक (१६)

परमात्मा का जब तत्वज्ञान, अज्ञान दूर कर देता है,

या ज्ञान सूर्य जब उदित हुआ, उसके भ्रम को हर लेता है।

तब उसे सच्चिदानन्द रूप, परमात्मा के होते दर्शन,

आलोकित हो जाता है तब, उस साधक का सारा जीवन ।

श्लोक (१७)

जिसका मन हो तद्रूप रहा, जिसकी गति हो तद्रूप रही,

आनन्दकन्द परमात्मा में, जिसकी गति एकीभाव रही ।

वह पुरुष तत्परायण अर्जुन, होता है पाप रहित ज्ञानी,

फिर नहीं आगमन है उसका, पाता वह अव्यय पद ज्ञानी ।

 

हो ब्रह्म परायण, ब्रह्म भाव का भली भाँति निर्वाह करे,

भर जाए हृदय भावना से सब में उसकी समदृष्टि जगे ।

जिस तरह सूर्य को अन्धकार अमृत को मृत्यु नहीं दिखती,

ऊष्मा न चन्द्रमा को भासे बस दृष्टि एक ही छवि लखती ।

श्लोक (१८)

हे पार्थ रहे वे समदर्शी, सब में समभाव रहा उनका,

विनयी विद्वान विप्र हो या, चाण्डाल, नहीं अन्तर करता ।

गौ हो, हाथी हो या कूकर, सबको समान लखता है वह,

परमात्मा सबमें बसा हुआ, उसको सबमें लखता है वह ।

 

कैसे टिक सके भेद उसमें, यह मेरा है,वह तेरा है,

इसमें सुख ही सुख रहा भरा, उसमें दुख बसा घनेरा है ।

जाग्रत अद्वैत बोध जिनका, उनमें न भेद का भाव रहा,

सर्वत्र एक परमात्मा का, रहता है उनमें भाव जगा ।

 

जिसकी है दृष्टि समान पार्थ, वह स्वयं ब्रह्म का रूप रहा,

भोगों का वह उपभोग करे, लेकिन वह सदा असंग रहा ।

मानव शरीर धारण कर भी, वह रहा अतनुधारी अर्जुन,

बन्धन का कारण नहीं रहा, उसको उसका लौकिक जीवन ।

श्लोक (१९)

आनन्द रूप परमात्मा जो, निर्दोष और सम रहा निहित,

सम भाव सुस्थित जिसका मन, जिनके द्वारा संसार विजिता

इस जीवन में ही सिद्ध काम, हो गये पुरुष वे, हे अर्जुन,

जग में रहकर जग दोषों से, हो मुक्त रहा उनका जीवन

श्लोक (२०)

जो प्रिय को पाकर मुदित न हो, उद्विग्न न हो जब अप्रिय मिले,

समबुद्धि रहे, संशयविहीन, मन ब्रह्मवृत्ति में सदा जगे ।

जो पार- ब्रह्म परमात्मा में, रखता हो एकीभाव सदा,

वह रहा ‘ब्रह्मवित्’ हे अर्जुन, वह देहभाव में नहीं रहा ।

श्लोक (२१)

बाहर के विषयों में जिसकी, आसक्ति समूल समाप्त हुई,

आत्मा में स्थित ध्यान रहा, मन में हो सात्विकता उत्तरी ।

आनन्द प्राप्त उसको होता, वह लीन योग में हो जाता,

सच्चिदानन्द परमात्मा को, वह अपने अन्तस में पाता ।

 

होकर अभिन्न परमात्मा से, अनुभव करता आनन्द अमित,

वह ‘ब्रह्मयोग मुक्तात्मा’ है वह जीता है बस प्रभु के हित ।

 

वह मुक्त पुरुष इन्द्रिय सुख से, या विषय सुखों से अनासक्त,

हो आत्मलीन अनुभव करता, सुख अनुपम रहकर समाधिस्थ ।

एकाग्र भाव रखकर प्रभु में, करता अनन्त सुख-आस्वादन,

इन्द्रिय-सुख से उपराम वृत्ति, प्रभु-भाव-भावना-भावित मन । क्रमशः…