‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..47

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 47 वी कड़ी ..

चतुर्थोऽध्यायः – ज्ञान योग

दिव्य ज्ञान का योग, ज्ञान-कर्म-सन्यास योग “याने ज्ञान और कर्म के सच्चे -त्याग का योग 

श्लोक (११)

जो मुझे भावना ले जैसी भजते हैं, भजता मैं उनको,

हैं अलग अलग बहु मार्ग मगर सब पाने के केवल मुझको ।

जिसका जो पूजन भाव रहा, मैं उसका ही अनुसरण करूँ,

जिसको न सहन मेरा वियोग, मैं उससे कभी न दूर रहूँ।

 

जो जिस प्रकार आता है, मेरे पास, पार्थ मैं अपनाता,

सब राहें मेरी राहें हैं, भजता जो मुझे, मुझे पाता ।

व्याकुल जो मेरे लिए हुआ, उसके हित में व्याकुल होता,

सर्वस्व करे मुझको अर्पण, मैं उसको सबकुछ दे देता ।

 

परमात्मा को पाने की जिसमें होती व्याकुलता गहरी,

क्या रही भावना उसकी, मेरी रुचि केवल उसमें ठहरी ।

जो सखा मानता है मुझको, मैं उसको मित्र समान मिलूँ,

जो सेवक बनकर ध्याता है, मैं स्वामी बनकर ध्यान रखूँ

 

यह मनुज मात्र की प्रकृति रही वे मेरा भजन किया करते,

पर ज्ञान न होने के कारण, मेरा निज रूप नही लखते ।

एकात्म रूप को वे अनेक रूपों में भजने लगते हैं,

साकार रूप में लखते वे, मेरे बहुरूप उभरते हैं

 

मैं भूतमात्र में विद्यमान, हूँ नाम रहित, आकार रहित,

पर साथ कल्पना के उनकी, हो जाता हूँ आकार सहित ।

मैं निर्गुण होकर सगुण बनूँ, ज्यों रही भावना भक्तों की,

सबकी इच्छा पूरी करता, अपने भक्तों अनुरक्तों की ।

 

हर साधक से मैं मिलता हूँ, करता हूँ पूरी अभिलाषा,

जैसी जिसकी जो प्रकृति रही, वैसी बलवती करूँ आशा ।

सार्थकता रूप-कोटियों की, यह रही कि वे फल देती हैं,

हो परम चेतना व्यक्त जहाँ, वे किन्तु अन्यतम होती हैं ।

 

कर्मों से ही फल प्राप्त यहाँ, यह धरा कर्म का लोक रही,

देने वाला, लेनेवाला है, कर्म यहाँ रे अन्य नहीं ।

जो बीज गिरेगा धरती पर, उत्पन्न वही तो होता है,

वह रूप आइना दिखलाता, जो रूप सामने होता है ।

 

लौटा करती प्रतिध्वनियाँ बन, पर्वत से टकराकर ध्वनियाँ,

कर देता है विश्वास फलित अपने ही कर्मों का गुनियाँ ।

 

मैं सबमें  रहाकर भी सबमे रहता हूँ अलग , सुनो अर्जुन ,

मै रहा अकर्ता अविनाशी, करके यह सारा सृष्टि-सूजन ।

हर एक जगह मैं हूँ समान, भिन्नत्व मन्दमति रोप चलें,

कितने ही देवी-देव नाम से मेरा ही वे भजन करें ।

 

सारी उपासनाओं का दृष्टा, मैं ही होता हूँ अर्जुन,

फलवती भावना होती है साधक के कर्मो का फल बन ।

अपनी इच्छा की पूर्ति हेतु करता मनुष्य नव अनुष्ठान,

केवल मनुष्य की योनि रही, जिसमें उपासना का विधान ।

श्लोक (१२)

अपने कर्मों का फल पृथ्वी पर यहीं चाहते हैं जो जन,

देवों को कर लेते प्रसन्न, कर उनका पूजन आराधन ।

जिसका जैसा सामर्थ्य, देवता पूरी कर देता इच्छा,

लेकिन इच्छाओं के रहते, कल्याण न प्राप्त जीव करता ।

श्लोक (१३,१४,१५)

अर्जुन देखो ये चार वर्ण, मैंने इनको उत्पन्न किया,

गुण और कर्म आधार रहे, जिनपर इनका विस्तार किया ।

चारों वर्णों के कर्मों की है प्रकृति भिन्न, गुण भिन्न रहे,

इस तरह व्यवस्था के पाये, मानो ये अपने आप सधे ।

 

अर्जुन मैं सृजन हार होकर भी नहीं रहा इनका सृष्टा,

मैं करता कोई कर्म नहीं अदृश्य रूप से पर लखता ।

आसक्ति रहित जो उदासीन, सम्बन्ध कर्म से क्या उसका ?

हो रहीं व्यवस्थाएँ सारी, पर मैं न रहा उनका कर्ता

 

कर्मों के फल से स्पृहा नहीं इसलिए न लिप्त कर्म करते !

जो जान रहे मेरा स्वभाव उनको न कर्म बन्धन बनते !!

हे अर्जुन पूर्व मुमुक्षुओं ने, यह जान किए सम्पन्न कर्म !

पूर्वज जो करते आए हैं, तू भी पालन कर वही धर्म  ! ! क्रमशः…