‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..46

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 46 वी कड़ी ..

चतुर्थोऽध्यायः – ज्ञान योग

दिव्य ज्ञान का योग, ज्ञान-कर्म-सन्यास योग “याने ज्ञान और कर्म के सच्चे -त्याग का योग 

श्लोक (७,८)

हे भारत, जब जब हानि धर्म की होती है अधर्म बढ़ता,

तब-तब इस धरा धाम पर मैं साकार रूप धारण करता ।

उद्धार साधुओं का करने संहार रचाने दुष्टों का,

स्थापित करने धर्म पार्थ, युग-युग में तन धारण करता ।

 

सीमा अधर्म की तोड-फोड दोषों का नाम मिटाता हूँ,

जो साधु सन्त द्विज दीन रहें, आनन्द उन्हें पहुँचाता हूँ।

दैत्यों के कुल का नाश करूँ, भक्तों की करता हूँ रक्षा,

करते जो धर्माचरण पार्थ, पूरी करता उनकी इच्छा

श्लोक (९)

हे अर्जुन-जन्म कर्म मेरे हैं दिव्य अलौकिक अमल सदा,

जिसको यह तात्विक ज्ञान हुआ, वह देह त्याग पर मुझे मिला।

तज देहभाव वह परम मुक्त प्रतिफलित करे मेरी इच्छा,

उसका न जन्म फिर होता है वह नहीं बन्धनों में बँधता ।

श्लोक (१०)

पहिले भी मुझको प्राप्त हुए, जो अभय, अराग अक्रोध रहे,

जो प्रेमाम्बुधि में मेरे ही, मेरे होकर बस लीन रहे ।

मेरे आश्रित जो भक्त रहे, जो हुए पवित्र तप में तपकर,

कर देह त्याग वे एक हुए, मुझमें, मेरा स्वरूप बनकर ।

 

पृथ्वी पर मुझ असीम की, ही प्रतिमाएँ हैं मुक्त आत्मायें,

ऊपर उठकर मानव कैसे बनता विभु उसकी क्षमतायें ।

पूर्णत्व प्राप्त कर ले मनुष्य- यह धर्म घोषणा करता है,

वह स्वयं सत्य है, सत्य मार्ग पर जो जीवन भर चलता है।

 

मेरे स्वरूप के प्राप्त हुए, अपने को धन्य समझते हैं,

मेरी सेवा में तत्पर वे, जीवन का अर्पण करते हैं ।

होता है उनको ज्ञान बोध, अरु तप का तेज निखरता है,

कर्मों में जागा दिव्य भाव, तीर्थों को पावन करता है ।

 

लेता हूँ जब अवतार पार्थ, पर्वत पापों के ढह जाते,

होता है पुण्य उदित सबका, सात्विक गुण मन में उभराते ।

पाशविक स्वरूप का क्षय होता, सौन्दर्य दिव्यता का दीखे,

नर से नारायण बनने की, उत्सुकता जन जन में दीखे।

 

रुचि जागे विश्व – व्यवस्था में, तादात्म्य प्रकृति से करे स्वयं,

करुणा मैत्री सात्विकता का विकसित होता मानव-जीवन ।

हे पार्थ हेतु हैं बहुतेरे, अवतार मुझे लेना पड़ता,

जब नहीं सन्तुलन रह पाता, मुझको भू पर आना पड़ता ।

 

पैदा करने विश्वास नया, जग-जीवन सरस बनाने को,

पा सकता मुझको हर मनुष्य, ऐसा विश्वास जगाने को ।

जीवन में मुझको पाने की, रखता है हर मनुष्य क्षमता,

विश्वास स्वयं पर रखकर जो, हो अपने सत्-पथ पर चलता। क्रमशः…