‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 122 ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 122 वी कड़ी ..

                   एकादशोऽध्यायः ‘विश्व रूप दर्शन योग’

             अध्याय ग्यारह – ‘भगवान का दिव्य रूपान्तर’

श्लोक   (१५)

रोमांचित तन, नत नयन, बद्धकर, अर्जुन ने करके प्रणाम,

राजन यह कहा कि हे भगवन, कृतकृत्य हुआ मैं सिद्धकाम ।

मेरा विस्तार अपार हुआ, कर रहा आपके मैं दर्शन,

पार्थिव जग के कोलाहल से, अति दूर रहा यह उत्कर्षन ।

 

हम पर हावी हो जाते है, दुनिया के कष्ट सहजता से,

पर कितनी सीमित यह दुनिया, जिसके हम पार न लख पाते ।

प्रभु तेरी सृष्टि नहीं सीमित, ब्रह्माण्ड अंश यह ग्रह केवल,

यह विश्व विभासित है असीम, इसमें आत्मा के दल के दल ।

 

हे भगवान, मैं तेरे तन में, सारे देवों को देख रहा,

मैं देख रहा सब जीवों को, उनके समूह सब देख रहा ।

मैं देख रहा हूँ ब्रहा को जो सारी सृष्टि विरचते हैं,

ऋषियों को देख रहा भगवन, जो तेजस्वी तप करते हैं ।

 

नागों को देख रहा हूँ मैं, जो दिव्य रहे जो रहे विपुल,

वासुकि समेत पाताल लोक के, सब सर्पों को यहाँ सकुल ।

मैं स्वर्ग नर्क पाताल सभी लोकों के जीवों को देखें,

त्रिभुवन का जो आधार देव, मैं उस शरीर को भी देखूँ ।

 

मन्दार अचल पर जगह-जगह श्वापद ज्यों रहे घाटियों में,

चौदह भुवनों के विविध संघ, त्यों लटके प्रभु तेरे तन में ।

तरु पर ज्यों नीड़ पक्षियों के, त्यों सुरगण दीख रहे भगवन,

पञ्चक अनेक अरु भूत सृष्टि, यह यि देह करती धारण ।

 

अर्जुन ने कहा कि हे भगवन, परिव्याप्त आपका यह शरीर,

मैं देख रहा इसमें बसते, सम्पूर्ण देवता, सकल जीव ।

कमलासन पर बैठे विरंचि, वासुकि पर पौढ़े रमाकान्त,

ऋषि स्वर्ग लोक, पाताल नाग, त्रिभुवन पति देखे उमाकान्त ।

श्लोक   (१६)

सम्पूर्ण जगत के स्वामी है, यह अदभुत रहा विराट रुप,

मैं देख रहा इसके बहुत मुख, बहु कर इसके बहुनेत्र रुप ।

बहु उदर अनेक रुपवाले, दिशि दिशि में अमित प्रसार रहा,

इसका न आदि या मध्य दिखे, इसका अनन्त विस्तार रहा।

 

सब ओर अनन्त रुप में तुझ को, देख रहा मैं हे भगवन,

तेरी न भुजाओं की गिनती, तेरे मुख, नेत्र रहे अनगिन ।

कितने हैं उदर, असंख्य रहे, सब ओर प्रसार अनन्त रहा,

प्रारम्भ, मध्य या अन्त कहाँ, इसका न कहीं भी पता मिला ।

 

हे जगतमणि मैं देख रहा, हैं आप स्वयं अपने तन में,

कुल गोत्र समस्त महर्षियों के हो रहे व्यक्त सब प्रभु तुझमें ।

दाँये, बायें ऊपर नीचे, आगे पीछे बस आप रहे,

अगणित रुपों से युक्त रहे, हर एक दिशा में व्याप्त रहे ।

श्लोक   (१७)

बहु सिर, सिर पर बहु मुकुट रहे, बहु कर जो धारे चक्र गदा,

शोभित स्वरुप अति तेजो मय, हर दिशा प्रकाशित रही सदा ।

तेजोमय इतना अधिक रुप, सम्भव न देख पाना इसको,

ज्यों नेत्र निमीलित हो जाते, जो देखें दीप्त दिवाकर को ।

 

मैं देख रहा हूँ व मुकुट युक्त, अरु चक्रयुक्त अरु गदा युक्त,

प्रज्जवलित अग्नि रवि के समान, मार्तण्ड समान ज्योति युक्त ।

भगवान रुप यह दुर्निरीक्ष्य, प्राकृत दृग इसे न देखे सकें,

अप्रमेय रहा, इसकी सीमा, गुण शक्ति कौन जो लेख सकें।

 

लगता है मानो सकल सृष्टि, इस महातेज में डूब गई,

विद्युत से ज्यों आकाश ढँका, यह रही अदेखी छटा नई।

इस दिव्य दृष्टि को पाकर भी, मैं नहीं देख पाता उसको,

इस प्रखर तेज से तन जलता, हो रहा कष्ट मेरे दृग को ।

 

भगवन इतना दाहक प्रकाश, भूतात्मक तन जल राख हुए,

यह धरती से उठकर मानो, जो अन्तहीन आकाश छुए ।

इस रुप तेज का चमत्कार, सर्वत्र दिखाई देता है,

झप जाता देख अनल जिसको, निस्तेज तरनि हो लेता है।

श्लोक   (१८)

प्रभु आप अकेले ही ऐसे, जो रहे जानने योग्य परम,

परब्रह्म आप हैं जगदी श्वर, आश्रय निधान जग के भगवन ।

रक्षक हैं धर्म-सनातन के, हैं पुरुष पुरातन अविनाशी,

ऐसा मत मेरा त्रिभुवनपति, हैं आप नित्य घट घट वासी ।

 

जग कारण-कार्य सहित भगवन, केवल तुम में आश्रय पाए,

जो रहे सदा जो सदा चले, वह धर्म आपसे बल पाए ।

समरस रहकर जो दिपे सदा, जो क्षीण न हो, जो दीन न हो,

जो मुक्त विकारों से भगवन, तुम वही सनातन पुरुष प्रभो ।

 

मात्राएँ साढ़े तीन जहाँ, ओंकार ब्रह्म के परे आप,

आवास न खोज सके आगम, थक गए बहुत करके प्रयास ।

लय प्राणिमात्र हो रहा जहाँ, आधार विश्व को जहाँ मिले,

वह अव्यय, धर्म सनातन प्रभु, तत्वों के ऊपर तत्व खिले । क्रमशः…