नगर निगम सोया तो फावड़ा लेकर नाले में उतरे पार्षद, मचा हड़कंप !

‘फाइव-स्टार’ सिस्टम को पार्षद का ‘फावड़ा मार’ जवाब: जब वातानुकूलित कुर्सियां सो गईं, तो नाले में उतरा जनसेवक !

✍️ राकेश प्रजापति 

सरकारी फाइलों में जब ‘स्वच्छ भारत’ की गुलाबी तस्वीरें तैर रही होती हैं, ठीक उसी वक्त जमीन पर क्या तैर रहा होता है ? जवाब है— ‘मलबा, कीचड़ और नगर निगम की बेशर्म उदासीनता।’ लेकिन जब प्रशासनिक लापरवाही का घड़ा (या यूं कहें कि नाला) पूरी तरह लबालब हो जाए, तो सिस्टम के भरोसे बैठे रहने वाले कायर कहलाते हैं। छिंदवाड़ा के वार्ड नंबर 42 (गुलाबरा) में यही हुआ। जब नगर निगम के ‘साहबों’ के कानों पर जूं रेंगना बंद हो गई, तो माननीय पार्षद संदीप चौहान ने खुद कमान संभाली। शनिवार को वे किसी तामझाम, प्रोटोकॉल या  नौटंकी के बिना, सीधे हाथ में फावड़ा थामकर नाले के बजबजाते कीचड़ में उतर गए।

जनप्रतिनिधि को इस तरह घुटने तक कीचड़ में धंसकर सफाई करते देख एसी कमरों में दुबके नगर निगम प्रशासन के हलक में जैसे सूखा पड़ गया। पूरे महकमे में ऐसा हड़कंप मचा कि मानो किसी ने उनकी सबसे गहरी नींद में खौलता पानी डाल दिया हो।

कागजी घोड़ों के आगे बेबस जनता और ‘अंधा-बहरा’ प्रशासन

गुलाबरा क्षेत्र का मुख्य नाला बीते लंबे समय से चोक पड़ा था। वहां से उठने वाली सड़न और बदबू केवल नाक बंद करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह इलाके के बच्चों और बुजुर्गों के लिए जानलेवा संक्रामक बीमारियों का ‘बायोलॉजिकल वेपन’ (जैविक हथियार) बन चुकी थी। पार्षद संदीप चौहान ने इस नरक से मुक्ति के लिए नगर निगम के अधिकारियों के चक्कर काट-काटकर अपनी चप्पलें घिस दी थीं। ढेरों शिकायतें, अनगिनत मांगें— लेकिन कागजी घोड़े दौड़ाने वाले प्रशासन ने इसे अपनी शाही शान के खिलाफ समझा और फाइलों को दबाकर बैठ गया। निगम की इस ‘लापरवाह और अंधी’ अनदेखी से तंग आकर आखिरकार पार्षद ने तय किया कि सिस्टम अगर मर चुका है, तो उसका अंतिम संस्कार श्रमदान से ही होगा।

बिना किसी ‘लवाजमे’ के सीधे कचरे पर वार

आमतौर पर राजनेताओं को केवल चुनाव के वक्त या फोटो खिंचवाने के लिए झाड़ू पकड़े देखा जाता है, जहाँ चार फोटोग्राफर और दस चमचे आगे-पीछे डोलते हैं। लेकिन यहाँ नजारा अलग था। पार्षद श्री चौहान बिना किसी तामझाम के, एक आम मजदूर की तरह नाले के भीतर उतरे और फावड़े से कीचड़-कचरा बाहर फेंकने लगे। यह नजारा उन अफसरों के मुंह पर सबसे बड़ा तमाचा था जो टैक्स का पैसा डकारकर मखमली कुर्सियों पर बैठकर ‘स्वच्छता का ज्ञान’ बांटते हैं।

अनोखे तेवरों के उस्ताद: जब अपनी ही सरकार में उठाना पड़े ‘हथियार’

दिलचस्प और तीखी बात यह है कि राज्य में अपनी ही पार्टी की सत्ता होने के बावजूद पार्षद चौहान को जनता के हक के लिए इस तरह के अनोखे और उग्र प्रदर्शन करने पड़ते हैं। यह इस बात का सबूत है कि जब सिस्टम की रीढ़ की हड्डी गल जाती है, तो पार्टी लाइनों से ऊपर उठकर लड़ना पड़ता है। अभी कुछ दिन पहले ही जब पेयजल संकट गहराया था, तो उन्होंने खुद ट्रैक्टर-टैंकर की स्टेयरिंग संभाली थी और घर-घर पानी पहुंचाया था।

अब नाले में उतरकर सिस्टम की ‘गंदगी’ साफ करने का उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है। स्थानीय नागरिक उनके इस जज्बे को सलाम कर रहे हैं और पूछ रहे हैं— “अगर नाला भी पार्षद को ही साफ करना है, तो नगर निगम के दफ्तर में बैठकर करोड़ों का बजट डकारने वाले उन ‘सफेद हाथी’ अफसरों को नौकरी पर क्यों रखा गया है ?”

सिस्टम के ठेकेदारों ! अगली बार जब अपनी आलीशान गाड़ियों से उतरो, तो गुलाबरा के इस नाले को जरूर देख लेना, जहाँ तुम्हारी ‘कर्तव्यनिष्ठा’ सड़ रही है।