छिंदवाड़ा राजनीति में उबाल: कांग्रेस-भाजपा दोनों में बढ़ी अंदरूनी कलह ..

बेलगाम होती सियासत: कांग्रेस में कमलनाथ की खामोशी, भाजपा में खेमेबाजी से बिगड़ते समीकरण

✍️ राकेश प्रजापति 

छिंदवाड़ा की राजनीति इन दिनों अजीब मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की पहले जैसी सक्रियता नजर नहीं आ रही, तो दूसरी तरफ भाजपा में सांसद और जिलाध्यक्ष के बीच खेमेबाजी ने संगठनात्मक संतुलन बिगाड़ दिया है। दोनों प्रमुख दलों के भीतर बढ़ती यह अंतर्कलह अब कार्यकर्ताओं के बीच खुलकर चर्चा का विषय बन चुकी है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे हैं कि आखिर जिले की राजनीति की कमान किसके हाथ में है ?

कांग्रेस खेमे में लंबे समय तक कमलनाथ की मजबूत पकड़ और सक्रिय हस्तक्षेप अनुशासन का आधार रहे। टिकट वितरण से लेकर संगठनात्मक फैसलों तक उनकी निर्णायक भूमिका ने नेताओं को एक सीमा में बांधे रखा। लेकिन हाल के महीनों में उनकी अपेक्षाकृत कम सक्रियता ने स्थानीय स्तर पर कई नेताओं को खुलकर अपनी-अपनी लाइन खींचने का अवसर दे दिया है।

  • वरिष्ठों का मौन और अध्यात्म का सहारा: जिले के दिग्गज और वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने होंठ सिल लिए हैं। कुछ सीनियर नेताओं की चुप्पी तो समझ आती है, लेकिन कुछ ने तो अब ‘सियासी मोह’ छोड़कर सीधे भगवत शरण की राह पकड़ ली है। उनका यह आध्यात्मिक यू-टर्न चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • कांग्रेसी विधायकों का ‘साइलेंट मोड’: जिले के कांग्रेसी विधायक इस समय अजीब सी निष्क्रियता के दौर से गुजर रहे हैं। जनता और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी यह रहस्यमयी दूरी जिले में कांग्रेस के भविष्य पर बड़े सवाल खड़े कर रही है।

 नतीजा यह है कि कांग्रेस के भीतर एकला चलो वाली राजनीति तेजी से सिर उठा रही है। कई नेता अब बिना किसी केंद्रीय समन्वय के अपने-अपने शक्ति प्रदर्शन में जुटे हैं, जिससे संगठनात्मक एकजुटता कमजोर होती दिख रही है।

कांग्रेस के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि जल्द ही शीर्ष नेतृत्व ने स्पष्ट संदेश नहीं दिया, तो यह बेलगामी आने वाले चुनावों में पार्टी के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा भी बन रही है कि नेतृत्व के शिथिल पड़ते ही स्थानीय गुट अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने में लग गए हैं।

उधर भाजपा की स्थिति भी बहुत अलग नहीं दिख रही.

अगर आपको लगता है कि अनुशासनहीनता की यह बीमारी सिर्फ विपक्ष तक सीमित है, तो सत्ताधारी दल भाजपा का हाल देख लीजिए। यहाँ “ऑल इज वेल” का बोर्ड तो लगा है, लेकिन अंदरूनी खींचतान चरम पर है।

  • खेमेबाजी का खुला खेल: जिले में भाजपा के सांसद और जिलाध्यक्ष के बीच की अंदरूनी रार अब दबी-छुपी नहीं रही। दोनों गुटों की यह तनातनी पार्टी के भीतर बेहद ‘अप्रिय और असहज’ हालात पैदा कर रही है।

  • कार्यकर्ता असमंजस के भंवर में: इस गुटीय जंग का सबसे बुरा असर आम कार्यकर्ताओं पर पड़ रहा है। जमीनी स्तर का कार्यकर्ता गहरे भ्रम (कन्फ्यूजन) में है। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह किस खेमे की जय-जयकार करे और किस खेमे से ‘सेफ डिस्टेंस’ यानी दूरियां बनाकर रखे।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि भाजपा में यह गुटबाजी कई बार अप्रिय हालात पैदा कर रही है। कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि उन्हें किस नेतृत्व की प्राथमिकता को तवज्जो देनी चाहिए। इससे जमीनी स्तर पर भ्रम और निष्क्रियता का माहौल बन रहा है।

स्पष्ट है कि छिंदवाड़ा की राजनीति फिलहाल बेलगाम दिखाई दे रही है। कांग्रेस में कमलनाथ की कम होती सक्रियता से पैदा हुआ नेतृत्व शून्य हो या भाजपा में सांसद-जिलाध्यक्ष की खेमेबाजी—दोनों ही दलों के लिए यह संकेत है कि यदि समय रहते अनुशासन और समन्वय स्थापित नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर आगामी चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।

राजनीति में जब ‘कंट्रोलर’ ही थोड़ा धीमा पड़ जाए, तो नीचे की कमान संभाल रहे सिपहसालार खुद को सुल्तान समझने लगते हैं। जिले के राजनैतिक गलियारों से आ रही ताजा हवाएं कुछ ऐसी ही कहानी बयां कर रही हैं। यहाँ सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों ही खेमों में अनुशासन की दीवारें दरक चुकी हैं और कार्यकर्ता इस “अनकंट्रोल पॉलिटिक्स” के बीच चौराहे पर खड़े होकर दिशा ढूंढ रहे हैं।