जिंदा बच्चों को सरकारी रिकॉर्ड में मार रहा सिस्टम ! कौन हैं जिम्मेदार ?

जिंदा बच्चों को ‘मार’ रहा सरकारी सिस्टम: छिंदवाड़ा में रिकॉर्ड की कब्रगाह में दफन हो रही मासूमों की पहचान

कागजों में मौत, हकीकत में जिंदगी… आखिर किसके भरोसे चलेगा प्रशासन ?

सरकारी लापरवाही अब केवल फाइलों की गलती नहीं रही, बल्कि नागरिकों के अस्तित्व पर हमला बन चुकी है। छिंदवाड़ा जिले में एक बार फिर ऐसा मामला सामने आया है जिसने साबित कर दिया कि यहां सरकारी रिकॉर्ड में किसी इंसान का जिंदा रहना भी अधिकारियों की मेहरबानी पर निर्भर है। परासिया विकासखंड के कवराम गांव के 14 वर्षीय नीतिक पवार को सरकारी दस्तावेजों में मृत घोषित कर दिया गया, जबकि वह पूरी तरह स्वस्थ होकर अपने घर में जीवन बिता रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकारी रिकॉर्ड में मौत लिखने से पहले क्या किसी जिम्मेदार अधिकारी ने एक बार भी सत्यापन करना जरूरी नहीं समझा ? या फिर जिले का पूरा प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित होकर रह गया है ?

✍️  राकेश प्रजापति 

करीब तीन माह पहले खेत में किसी जीव के काटने से नीतिक की तबीयत बिगड़ी। सर्पदंश की आशंका पर उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज के बाद वह पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौट आया। लेकिन कुछ समय बाद जब आंगनवाड़ी कार्यकर्ता मुआवजा प्रक्रिया के सिलसिले में उसके घर पहुंची तो परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई। सरकारी रिकॉर्ड में नीतिक को मृत घोषित किया जा चुका था।

यानी जिस बच्चे की सांसें चल रही थीं, जिसके साथ परिवार हर दिन जी रहा था, उसी की मौत का सरकारी दस्तावेज तैयार हो चुका था।

सिस्टम पहले भी ‘जिंदा बच्चों की हत्या’ कर चुका है

यह कोई अकेली घटना नहीं है। इससे पहले छिंदवाड़ा जिले के थावड़ीकला गांव के सोनी परिवार के 12 वर्षीय मासूम को भी सरकारी रिकॉर्ड में मृत दर्ज कर दिया गया था। उस एक गलती ने पूरे परिवार की जिंदगी को एक वर्ष तक सरकारी दफ्तरों की चौखट पर खड़ा रखा।

परिवार लगातार तहसील, जनपद, शिक्षा विभाग और अन्य सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटता रहा। सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित होने के कारण बच्चे का शासकीय विद्यालय में प्रवेश तक नहीं हो सका। एक जीवित बच्चा शिक्षा के संवैधानिक अधिकार से केवल इसलिए वंचित रहा क्योंकि सरकारी फाइलों ने उसे “मृत” मान लिया था।

स्थिति तब बदली जब यह मामला मीडिया में प्रमुखता से उठा। जनदबाव बढ़ा और तब जाकर जिले के वरिष्ठ अधिकारियों की नींद टूटी। करीब चार दिन पहले बच्चे का नाम शासकीय रिकॉर्ड में सुधार दिया गया।

गलती सुधार दी… लेकिन दोषी कौन ?

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि दो-दो गंभीर मामलों के सामने आने के बावजूद आज तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी पर कार्रवाई नहीं हुई। न निलंबन, न विभागीय जांच का परिणाम और न ही जवाबदेही तय हुई।

यदि एक जीवित बच्चे को मृत घोषित कर देना भी विभागीय अपराध नहीं माना जाएगा, तो आखिर किस गलती पर कार्रवाई होगी?

अक्सर ऐसे मामलों में अधिकारी “तकनीकी त्रुटि” कहकर जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। लेकिन जब एक गलत एंट्री किसी बच्चे की पहचान, शिक्षा, सरकारी योजनाओं के अधिकार और पूरे परिवार की सामाजिक स्थिति को प्रभावित कर दे, तब इसे केवल तकनीकी भूल कहना सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा।

यह घटना बताती है कि जिले की रिकॉर्ड प्रबंधन प्रणाली कितनी कमजोर है और सत्यापन की प्रक्रिया कितनी लापरवाह हो चुकी है।

जनता पूछ रही है…

आखिर जीवित बच्चों को मृत घोषित करने वाले अधिकारी कौन हैं ?

क्या उनके खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई होगी ?

क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जवाबदेही तय की जाएगी ?

या फिर हर बार मीडिया के हस्तक्षेप के बाद ही प्रशासन की नींद खुलेगी ?

छिंदवाड़ा में अब सवाल केवल एक बच्चे का नहीं है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता का है। यदि सरकारी रिकॉर्ड किसी जीवित बच्चे को मृत घोषित कर सकता है, तो आम नागरिक अपने अधिकारों की सुरक्षा किस भरोसे करेगा ?

फाइलों में जिंदा लोगों को मार देने वाला सिस्टम किसी भी लोकतांत्रिक प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आने के बावजूद दोषियों पर कार्रवाई नहीं हो रही। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक सरकारी रिकॉर्ड की यह ‘कागजी मौत’ किसी भी परिवार के दरवाजे पर दस्तक दे सकती है।