वन्यजीवों की निजता पर सोशल मीडिया का ‘लाइक’ ग्रहण: स्वयंभू पर्यावरणविदों की नासमझी बढ़ा रही है बाघों का संकट ..
डिजिटल युग में ‘वाहवाही’ और सोशल मीडिया पर चंद ‘लाइक्स’ बटोरने की अंधी दौड़ अब मूक वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। विशेषकर राष्ट्रीय पशु बाघ और अन्य वन्यप्राणियों की उपस्थिति की जानकारी को सार्वजनिक मंचों पर गैर-जिम्मेदाराना ढंग से परोसने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अब वन विभाग ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है।
पूर्व छिंदवाड़ा वनमंडल द्वारा जारी एक आधिकारिक अपील सह चेतावनी पत्र जारी किया है ! जिसमे पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के नाम पर चल रहे इस डिजिटल तमाशे पर गहरी चिंता व्यक्त की है। वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि जाने-अनजाने में खुद को ‘वन्यजीव प्रेमी’ या ‘पर्यावरणविद’ साबित करने की होड़ में लोग वन्यजीवों की जान जोखिम में डाल रहे हैं।
✍️ राकेश प्रजापति
संवेदना शून्य रील संस्कृति: टॉर्च मारकर शावक को प्रताड़ित करने का वीडियो वायरल
हाल ही में सोशल मीडिया पर प्रसारित एक विचलित करने वाले वीडियो का संज्ञान लेते हुए वन विभाग ने बताया कि कुछ तत्वों द्वारा एक बाघ के बच्चे (शावक) पर जान-बूझकर तेज टॉर्च मारकर उसे प्रताड़ित करने का प्रयास किया गया। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की हरकतें न केवल वन्यप्राणियों को मानसिक तनाव और आघात (Trauma) पहुंचाती हैं, बल्कि इंसानों और वन्यजीवों के बीच हिंसक टकराव की पृष्ठभूमि भी तैयार करती हैं।
वन विभाग ने समाज के प्रबुद्ध नागरिकों और प्रकृति प्रेमियों से पुरजोर अपील की है कि वे ऐसे संवेदनशील और प्रताड़ना से भरे वीडियो का सामाजिक बहिष्कार (Socially Boycott) करें, ताकि रील्स और व्यूज के भूखे इन कथित पर्यावरणविदों को हतोत्साहित किया जा सके।
पर्यावरण संवर्धन या शिकारियों को सीधा आमंत्रण ?
विज्ञप्ति में रेखांकित किया गया है कि किसी भी क्षेत्र में बाघ या अन्य वन्यजीवों के भ्रमण की सटीक लोकेशन, फोटो या वीडियो को तुरंत सोशल मीडिया पर वायरल करना वन्यजीव संरक्षण के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। जाने-अनजाने में जारी किए गए ये वक्तव्य और डिजिटल सामग्रियां असल में:
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शिकारियों के लिए मुखबिरी: असामाजिक तत्वों और शिकारियों को वन्यजीवों की सटीक लोकेशन आसानी से मिल जाती है।
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प्राकृतिक आवास में व्यवधान: भारी संख्या में हुड़दंगी और तथाकथित पर्यटक उस क्षेत्र की ओर रुख करते हैं, जिससे वन्यजीवों का प्राकृतिक गलियारा (Corridor) प्रभावित होता है।
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मानव-वन्यजीव संघर्ष: तनाव में आकर वन्यप्राणी आबादी वाले क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं या आक्रामक हो जाते हैं।
सीधे जेल की हवा: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत होगी सख्त कार्रवाई
पूर्व छिंदवाड़ा वनमंडल के वनमंडलाधिकारी ने इस चेतावनी पत्र के माध्यम से साफ कर दिया है कि भविष्य में वन्यप्राणियों की निजता को भंग करने, उन्हें प्रताड़ित करने या उनके प्रचार-प्रसार से उनकी जान खतरे में डालने वाले किसी भी कृत्य को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
विभागीय चेतावनी : यदि कोई भी व्यक्ति वन्यप्राणियों को परेशान करने या सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी सुरक्षा को खतरे में डालने का दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 (Wildlife Protection Act, 1972) की सुसंगत धाराओं के तहत कठोर आपराधिक मामला दर्ज कर जेल भेजा जाएगा।
ख़बरद्वार निष्कर्ष : सच्चा पर्यावरण संवर्धन सोशल मीडिया की स्क्रीन पर नहीं, बल्कि धरातल पर वन्यजीवों को उनका शांत एकांत प्रदान करने से होता है। वन विभाग की यह पहल एक कड़ा संदेश है कि यदि आप वन्यजीवों से प्रेम करते हैं, तो उनकी उपस्थिति को ‘ट्रेंड’ बनाने के बजाय ‘गुप्त’ और सुरक्षित रखने में प्रशासन का सहयोग करें।