पातालकोट जमीन घोटाला: आदिवासियों की करोड़ों की जमीन अफसरों ने कौड़ियों में खरीदी !

पातालकोट के ‘स्वर्ग’ पर नौकरशाहों का डाका: आदिवासियों की बेशकीमती जमीन ‘कौड़ियों’ के दाम समेटी, जांच के दायरे में साहब और उनके रिश्तेदार !

छिंदवाड़ा जिले में आदिवासियों की जमीनों पर रसूखदारों, भू-माफियाओं और नौकरशाहों की गिद्ध दृष्टि इस कदर गड़ चुकी है कि ‘जल, जंगल और जमीन’ के रक्षक आज अपने ही आशियाने से बेदखल किए जा रहे हैं। आदिवासियों को छलने के लिए नियम-कायदों को ताक पर रख देना और फर्जीवाड़े की बिसात बिछाना प्रशासनिक गलियारों में आम हो चुका है। ताजा और सबसे शर्मनाक मामला तामिया के चौरा पठार (पातालकोट व्यू पॉइंट) से सामने आया है, जहां स्वर्ग जैसी खूबसूरत और करोड़ों की कीमत वाली भारिया जनजाति की लगभग साड़े 11 एकड़ जमीन को महज 6 लाख रुपये की ‘कौड़ियों’ में अफसरों के रिश्तेदारों के नाम कर दिया गया।

इस महाफर्जीवाड़े की गूंज अब सांसद से लेकर प्रशासनिक महकमों तक है। मामला तूल पकड़ने के बाद कलेक्टर हरेंद्र नारायण ने जांच के आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन पीड़ित आदिवासियों के आंसू और चीखें चीख-चीख कर कह रही हैं कि इस अनैतिक खेल में रक्षक ही भक्षक बन चुके हैं।

✍️ राकेश प्रजापति 

दशकों से जो बंटवारा रुका था, साहबों की पोस्टिंग होते ही चंद दिनों में ‘कागजी खेल’ खत्म !

विवाद तामिया के चौरा पठार स्थित 22 एकड़ जमीन का है, जो मृतक नानहों भारती के वारिसों—विप्पा भारती और सिमिना बाई के बीच बंटी जानी थी। सालों से इस जमीन का सीमांकन और बंटवारा लटका हुआ था। लेकिन जैसे ही तामिया में तत्कालीन तहसीलदार, एसडीएम और बीएमओ की चौकड़ी जमी, वैसे ही एक जादुई ‘कागजी खेल’ शुरू हुआ।

जानकारों के मुताबिकअधिकारियों ने कथित मिलीभगत से जमीन का सबसे कीमती हिस्सा (जो पातालकोट का मुख्य व्यू पॉइंट है और जिसकी ऑन-रिकॉर्ड कीमत करोड़ों में है) सिमिना बाई के बेटे रामदास भारती के नाम चढ़ा दिया। इसके बाद बिना दूसरे पीड़ित पक्ष (मृतक विप्पा बाई के वारिसों) की जानकारी के, महज 6 लाख रुपये की रजिस्ट्री अपने ही करीबियों और रिश्तेदारों के नाम करवा ली।

“हम तहसील गए ही नहीं, कोरे कागज पर अंगूठे ले लिए”

  • धर्मती भारती (शिकायतकर्ता): “एक महीने तक तहसीलदार जमीन बेचने के लिए दबाव बनाते रहे। हमने मना किया, तो बाद में पता चला कि हमारे बिना बताए रजिस्ट्री ही हो गई।”

  • बुधमान भारती (शिकायतकर्ता): “हमें बंटवारे की कोई जानकारी नहीं है। सर्वे और ई-केवाईसी के नाम पर पटवारी और कोटवार ने कोरे कागज पर दस्तखत और अंगूठे ले लिए।”

  • रजनी भारती (शिकायतकर्ता): “पंचनामा रिपोर्ट में मेरे फर्जी हस्ताक्षर किए गए हैं। मैं हमेशा अंग्रेजी में दस्तखत करती हूं, जबकि पंचनामा में हिंदी में फर्जी साइन किए गए हैं।”

जानिए किसके नाम हुई रजिस्ट्री…

इस पूरे खेल में तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध है, क्योंकि रजिस्ट्रियां सीधे उनके परिवार और करीबियों के नाम पर हुई हैं:

पद और अधिकारी किसके नाम हुई रजिस्ट्री? रिश्ता / कनेक्शन अधिकारी का पक्ष

कामिनी ठाकुर


(तात्कालिक एसडीएम, जुन्नारदेव)

दिलीप सिंह ठाकुर


(निवासी: नरसिंहपुर, सिंहपुर)

एसडीएम कामिनी ठाकुर के पिता (रिटायर्ड प्रिंसिपल)। “मेरे द्वारा कोई जमीन नहीं खरीदी गई, आरोप निराधार हैं।”

जितेंद्र तामिया


(तात्कालिक बीएमओ)

जितेंद्र शाह


(निवासी: चावलपानी)

खुद अपने नाम पर रजिस्ट्री कराई। “मामला जांच में है, नियमों के तहत और शासकीय अनुमति से खरीदी हुई है।”

प्रियंका बालरेन


(तात्कालिक प्रभारी तहसीलदार)

उमराज की धर्मी


(31 वर्षीय, निवासी: सोहागपुर)

तहसीलदार प्रियंका बालरेन (वर्तमान चौरई तहसीलदार) के रिश्तेदार। “हमारे पूरे पेपर सही हैं, हमने हर किस्म की अनुमति ली है।”

इस पूरे मामले में पटवारी और कोटवार की भूमिका सबसे घातक रही है। पीड़ितों का सीधा आरोप है कि ई-केवाईसी और सरकारी सर्वे का झांसा देकर इन मैदानी अमलों ने भोले-भाले आदिवासियों से कोरे कागजों पर दस्तखत करवाए। इसके बाद बंद कमरों में बैठकर फर्जी बंटवारा और पंचनामा तैयार किया गया।

जिले भर में आदिवासियों की जमीन पर रसूखदारों का डाका: विधानसभा में गूंज चुके हैं 183 मामले !

तामिया का यह मामला कोई इकलौता उदाहरण नहीं है, बल्कि यह उस गहरे प्रशासनिक भ्रष्टाचार की बानगी है जो पूरे छिंदवाड़ा जिले में पैर पसार चुका है। आदिवासियों की जमीनों को अवैध रूप से गैर-आदिवासियों को ट्रांसफर करने का यह खेल लंबे समय से जारी है।

  • विधानसभा पटल पर उठे 183 मामले: कांग्रेसी विधायकों ने विधानसभा में छिंदवाड़ा जिले के भीतर आदिवासियों की जमीन गैर-आदिवासियों के नाम ट्रांसफर करने के लगभग 183 संदिग्ध मामलों की सूची सौंपकर सरकार को घेरा था। ये सभी मामले वर्तमान में जांच के अधीन बताए जा रहे हैं।

  • तत्कालीन कलेक्टर शिवेंद्र सिंह भी संदेह के घेरे में: जानकारों के मुताबिक आदिवासियों की जमीनों को कौड़ियों के दाम रसूखदारों और भू-माफियाओं को सौंपने के इस सिंडिकेट में तत्कालिक जिला कलेक्टर शिवेंद्र सिंह की भूमिका भी बेहद संदिग्ध बताई जा रही है। आरोप हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान ऐसे कई अनैतिक और असंवैधानिक फैसलों को मूक सहमति दी गई।

“गरीब आदिवासियों के साथ छल बर्दाश्त नहीं होगा”

मामला सामने आने के बाद क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।

“पीड़ित परिवार मेरे पास आए थे और उनके पास वीडियो व पुख्ता दस्तावेज मौजूद हैं। अधिकारियों ने आदिवासियों के साथ खुली धोखाधड़ी की है। मैंने कलेक्टर को सख्त जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। मैं आदिवासियों के साथ यह छल किसी कीमत पर होने नहीं दूंगा।”

विवेक बंटी साहू, सांसद, छिंदवाड़ा

“यह बेहद गंभीर और आदिवासियों के हक पर डाका डालने का मामला है। इस पूरे महाफर्जीवाड़े को मेरे द्वारा आगामी विधानसभा सत्र में पटल पर उठाया जाएगा और दोषी अधिकारियों को जेल भिजवाने तक हम शांत नहीं बैठेंगे।”

सुनील उईके, विधायक, जुन्नारदेव

जांच अधिकारी का बयान

“मामले की बारीकी से जांच की जा रही है। जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक प्रकरण के तकनीकी पहलुओं पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।”

संजय महराम, वर्तमान तहसीलदार, तामिया

बड़ा सवाल:

क्या मुख्यमंत्री के ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस’ के दावों के बीच छिंदवाड़ा का प्रशासनिक अमला इन रसूखदार साहबों पर कार्रवाई करने की हिम्मत जुटा पाएगा? या फिर हर बार की तरह जांच की फाइलों के नीचे आदिवासियों की चीखें दबा दी जाएंगी? पातालकोट के इस ‘स्वर्ग’ को लूटने वाले चेहरों का बेनकाब होना अब बेहद जरूरी है। ….शेष अगली कड़ी में