छिंदवाड़ा में प्रताड़ना से तंग आकर विवाहिता ने तोड़ा दम, समाज के ‘आधुनिक’ चेहरे पर करारा तमाचा
राकेश प्रजापति
हम २१वीं सदी के जिस ‘आधुनिक और विकसित’ भारत का दंभ भरते हैं, उसकी खोखली हकीकत को बयां करती एक रूह कंपा देने वाली खबर छिंदवाड़ा जिले से सामने आई है। जहां एक लाचार बेटी और बेबस मां ने ससुराल की प्रताड़ना से तंग आकर मौत को गले लगा लिया। चौरई थाना क्षेत्र के ग्राम चन्हैना खुर्द में रहने वाली प्रीति वर्मा ने जहरीला पदार्थ खाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। दो दिनों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूलने के बाद आखिरकार प्रीति ने दम तोड़ दिया।
लेकिन यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि हमारे उस समाज की व्यवस्था का संस्थागत कत्ल है जो आज भी बेटियों को सुरक्षा और सम्मान देने में नाकाम है।
खुशियों की मेहंदी बनी ‘मौत का पैगाम’
इस घटना का सबसे दर्दनाक और झकझोर देने वाला पहलू यह है कि जिस मेहंदी को सुहाग और खुशियों का प्रतीक माना जाता है, उसे प्रीति ने अपनी बेबसी और चीख को दर्ज करने का जरिया बनाया। सुसाइड करने से पहले प्रीति ने कागज का टुकड़ा नहीं ढूंढा, बल्कि अपने दोनों हाथों और पैरों पर मेहंदी से अपना दर्द… अपना ‘सुसाइड नोट’ लिख दिया।
हाथों-पैरों पर रची उस मेहंदी की एक-एक लकीर चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी कि उस पर ससुराल पक्ष द्वारा किस कदर जुल्म, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना ढाही गई। वह मेहंदी अब समाज से सवाल पूछ रही है कि आखिर कब तक बेटियां इस तरह खामोश कर दी जाएंगी?
१४ साल का सफर… और पीछे छूट गई १३ साल की मासूम
प्रीति वर्मा की शादी १४ साल पहले लखन वर्मा के साथ बड़े अरमानों के साथ हुई थी। दोनों की १३ साल की एक मासूम बेटी भी है, जिसके सिर से अब मां का साया हमेशा के लिए उठ चुका है। जिस उम्र में एक बेटी को अपनी मां के आंचल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उस उम्र में उसे यह खौफनाक हकीकत झेलनी पड़ रही है। मृतका के परिजनों ने ससुराल पक्ष पर गंभीर आरोप लगाते हुए न्याय की गुहार लगाई है। पीड़ित मां का रो-रोकर बुरा हाल है और उन्होंने प्रशासन से निष्पक्ष जांच कर दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की है। फिलहाल जिला अस्पताल में डॉक्टरों की टीम द्वारा पोस्टमार्टम किया जा रहा है।
सूट-बूट में छिपा आदिम समाज :
यह घटना हमारे आज के उस तथाकथित ‘मॉडर्न सोसाइटी’ के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है, जो सोशल मीडिया पर ‘महिला सशक्तिकरण’ के खोखले नारे लगाता है। हम चांद पर पहुंच गए, डिजिटल इंडिया की बातें करते हैं, लेकिन महिलाओं को लेकर हमारी सोच आज भी उसी आदिम युग में जी रही है जहां एक महिला की गरिमा और उसकी जिंदगी की कीमत कुछ भी नहीं है।
दिखावे की आधुनिकता: घर की चारदीवारी के भीतर आज भी बेटियां दहेज, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना की भट्टी में झुलस रही हैं।
जब तक समाज इन दोषियों का सामाजिक बहिष्कार नहीं करेगा और कानून इन्हें तुरंत सलाखों के पीछे नहीं भेजेगा, तब तक न्याय सिर्फ फाइलों में दबा रहेगा।
चौरई पुलिस के लिए अब यह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि उस मासूम बेटी और न्याय की आस में बैठी बूढ़ी मां को विश्वास दिलाने की परीक्षा है। हाथों-पैरों पर मेहंदी से लिखे उस ‘दर्द के दस्तावेज’ को सबूत मानकर क्या दोषियों को उनके किए की सजा मिलेगी? यह देखना बाकी है।