मप्र भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन: क्या बियाबान में धकेले गए वरिष्ठ नेता ?

मप्र भाजपा में ‘पीढ़ी परिवर्तन’ की बयार या कद्दावर दिग्गजों का राजनीतिक निर्वासन ?

विशेष विश्लेषणात्मक रिपोर्ट

✍️ राकेश प्रजापति 

राजनीति में समय का चक्र जब घूमता है, तो इतिहास की गवाह रहीं दीवारें भी ढह जाती हैं। मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर बीते सात-आठ वर्षों से चल रही ‘पीढ़ी परिवर्तन’ की प्रक्रिया कोई सामान्य प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह एक युग का अंत और नए सत्ता प्रतिष्ठान की स्थापना का मूक उद्घोष है। आलाकमान की नई रणनीति बहुत क्रूर और स्पष्ट है—बीते दौर के दिग्गजों की विरासत को हाशिये पर रखकर युवा चेहरों को शतरंज की बिसात पर आगे बढ़ाना। परंतु, सवाल यह उठता है कि क्या यह सचमुच संगठन का कायाकल्प है या फिर उन शिल्पकारों का ‘राजनीतिक निर्वासन’, जिन्होंने कभी अपने खून-पसीने से इस संगठन की नींव रखी थी ?

नेपथ्य में धकेले गए महानायक : इस पूरे परिदृश्य में सबसे तीखा मोड़ उन चेहरों की स्थिति को देखकर आता है, जो कभी मध्य प्रदेश की सियासत का रुख तय करते थे:

  • उमा भारती: साल 2003 में 10 साल के अभेद्य दिग्विजय साम्राज्य को ध्वस्त करने वाली भाजपा की ‘फायरब्रांड’ नेता आज राजनीतिक विमर्श से लगभग अदृश्य हैं। यह नियति की विडंबना ही है कि जिस सरकार की नींव उन्होंने रखी, उसी की भव्य इमारत में आज उनके लिए कोई मुख्य कमरा आरक्षित नहीं है।

  • नरोत्तम मिश्रा: कभी सरकार का संकटमोचक और सबसे मुखर चेहरा रहे पूर्व गृह मंत्री के समर्थकों के बीच अब यह खामोश सुगबुगाहट है कि ‘दादा’ को धीरे-धीरे मुख्यधारा से अलग कर एक सुनसान राजनीतिक बियाबान की ओर मोड़ा जा रहा है।

  • मार्गदर्शक मंडल का अभाव: दिल्ली में कम से कम लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे संस्थापकों के लिए ‘मार्गदर्शक मंडल’ का एक औपचारिक मुखौटा तैयार किया गया था (भले ही उसकी बैठकें न हुई हों), लेकिन मध्य प्रदेश के इन दिग्गजों के पास तो ऐसा कोई प्रतीकात्मक आश्रय भी उपलब्ध नहीं है।

  संगठन के इतिहास के पन्नों को पलटें, तो उन नामों की लंबी फेहरिस्त सामने आती है जिनका कभी सिर्फ नाम ही आदेश माना जाता था, पर आज वे सत्ता के नए गलियारों में अपरिचित से हो गए हैं:

  • सुमित्रा महाजन (ताई): इंदौर की सियासत की धुरी और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष की आवाज आज स्थानीय स्तर पर भी प्रतीकात्मक रह गई है।

  • संगठन के स्तंभ (मोगे और रघुनंदन शर्मा): कुशाभाऊ ठाकरे के दौर में जब मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ एक थे, तब कृष्ण मुरारी मोगे जैसा व्यक्तित्व अकेले 320 सीटों के समीकरण तय करता था। वहीं रघुनंदन शर्मा जैसे निष्ठावान नेता आज पूरी तरह सक्रिय भूमिका से विलग हैं।

  • कैबिनेट को प्रभावित करने वाले ‘कप्तान’: कप्तान सिंह जैसे संगठन महामंत्री, जो कभी कैबिनेट की बैठकों में बैठकर बड़े नीतिगत निर्णय करवा देते थे, और मेघराज जैन जैसे संगठन के महारथी, आज किसी कोने में शांत बैठने को विवश हैं।

  • वरिष्ठता का मौन: चाहे वह दलित चेहरा रहे सत्यनारायण जटिया व सत्यनारायण सत्तन हों, या विक्रम वर्मा, अनूप मिश्रा (अटल जी के भांजे), गौरी शंकर बिसेन, डॉ. गौरीशंकर सेजवार, पारस जैन, उमाशंकर गुप्ता, तपन भौमिक और हिम्मत कोठारी—इन सब दिग्गजों की चुप्पी यह बयां करने के लिए काफी है कि सत्ता की नई भाषा में पुराने शब्दों का महत्व घट गया है।

  •  राजमाता की विरासत संभालने वाली यशोधरा राजे सिंधिया और तेजतर्रार कुसुम महदेले को चुनावी समर से बाहर रखना यह साफ संदेश था कि पार्टी अब पुराने चेहरों के मोहपाश से पूरी तरह मुक्त हो चुकी है।

 यह दर्द सिर्फ उनका नहीं है जो बाहर हो चुके हैं, बल्कि उनका भी है जो वर्तमान में सदन के भीतर हैं। कई ऐसे सीनियर विधायक हैं जो अनुभव और योग्यता में किसी भी मंत्री पद से बीस बैठते हैं, लेकिन उन्हें मंत्रिमंडल की चौखट से दूर रखा गया है।

इन विधायकों के मन में केवल मंत्री न बन पाने की टीस नहीं है, बल्कि एक गहरी असुरक्षा भी है कि अगले चुनाव में ‘पीढ़ी परिवर्तन’ की कैंची कहीं उनके टिकट पर न चल जाए।

  • गोपाल भार्गव: हर मंत्रिमंडल विस्तार की खबरों में सबसे शीर्ष पर रहने वाला नाम आज भी एक विधायक के तौर पर कतार में खड़ा है।

  • भूपेंद्र सिंह और जयंत मलैया: सरकार चलाने का लंबा अनुभव रखने वाले ये कद्दावर नेता भी वर्तमान सत्ता संतुलन में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं।

  • अजय विश्नोई, अर्चना चिटनीस, गिरीश गौतम, सीता शरण शर्मा जैसे संसदीय ज्ञान के पंडित और प्रभुराम चौधरी, बिसाहूलाल सिंह, मीना सिंह, नागेंद्र सिंह, सुरेंद्र पटवा, ओम प्रकाश धुर्वे व रमाकांत भार्गव जैसे नेता आज केवल विधायी औपचारिकताओं तक सीमित होकर रह गए हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी जीवंत संगठन के लिए नई पौध को सींचना और युवाओं को कमान सौंपना अपरिहार्य है। प्रकृति का नियम भी यही है। लेकिन जब यह परिवर्तन ‘सम्मान’ की बलि देकर किया जाता है, तो संगठन के भीतर एक मूक अवसाद जन्म लेता है।

यदि नया नेतृत्व आगे बढ़ते हुए पुराने दिग्गजों को उचित आदर और उनकी सलाह को महत्व दे, तो कोई भी वरिष्ठ राजनेता सहर्ष (खुशी-खुशी) मार्ग प्रशस्त कर देगा। परंतु, वर्तमान मप्र भाजपा का परिदृश्य यह संकेत दे रहा है कि यहाँ बदलाव सहज संवाद से नहीं, बल्कि एक कड़े सत्ता-अनुशासन के तहत हो रहा है, जहाँ पुराने पत्तों का झड़ना नियति मान लिया गया है।