यातायात विभाग खानापूर्ति कर रहा है, निगम सिर्फ सर्वे कर रहा है, और प्रशासन AC रूम में सड़क सुरक्षा का ज्ञान बांट रहे है ..
छिंदवाड़ा शहर की यातायात व्यवस्था अब व्यवस्था नहीं, बल्कि एक सड़ा हुआ सिस्टम बन चुकी है। इस सिस्टम से परेशान शहर की जनता बार-बार गुहार लगाकर अब खून के आंसू रो रही है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं है। एक तरफ कंगाल यातायात विभाग, जिसके पास न स्टाफ है, न संसाधन, और दूसरी तरफ कंगाली में आटा गीला वाली कहावत को चरितार्थ करता नगर निगम। दोनों की निकम्मेपन की कीमत शहर की भोली-भाली जनता अपनी जान देकर चुका रही है।
✍️ राकेश प्रजापति
टैक्स के पैसों पर गड़ी लोहे की कीलें – भ्रष्टाचार का खुला स्मारक
यह कहानी आज की नहीं है। इसके पहले नगर निगम ने शहर की अंतरवर्ती सड़कों पर रोप डिवाइडर का ठेका अपने चहेते को दिया था। करोड़ों का खेल हुआ, और आज उस ठेके का कोई अता-पता नहीं। सड़कों की छाती पर आज भी गड़ी हुई जंग लगी लोहे की कीलें उस भ्रष्टाचार की चीख-चीख कर गवाही दे रही हैं। जनता के टैक्स के पैसे से हुए इस बंदरबांट पर वो कीलें आज भी मातम मना रही हैं।
नतीजा क्या हुआ ? निगम ने इस कड़वे अनुभव के बाद तो इस मामले में हाथ डालना ही बंद कर दिया। अब न डिवाइडर ठीक होते हैं, न ट्रैफिक सुधरता है।
निकम्मे अधिकारियों का “पालतू सिस्टम”
असली खेल तो पर्दे के पीछे चल रहा है। नगर निगम के निकम्मे अधिकारियों ने अपने कुछ पालतुओं को सेट कर रखा है। यही पालतू पूरे सिस्टम को मैनेज करते हैं। जनप्रतिनिधि से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक सबको सेट कर लिया जाता है, फाइलें दबा दी जाती हैं, और जनता की आवाज को वहीं दफन कर दिया जाता है।
इस सेटिंगबाजी का खामियाजा कौन भुगत रहा है? शहर की सड़कें आज रक्त पिपासु बन चुकी हैं। अवैध डिवाइडर, बेतरतीब कट, कहीं भी खड़े ऑटो-ठेले, और अंधे मोड़ – ये सब मिलकर रोजाना किसी न किसी निर्दोष को वक्त से पहले यमलोक पहुंचा रहे हैं।
प्रशासन का सड़क सुरक्षा नाटक
शहर में रोज एक्सीडेंट हो रहे हैं, लोग मर रहे हैं, और हमारे जिम्मेदार क्या कर रहे हैं ?
यातायात विभाग: चौराहे पर दो सिपाही खड़े कर खानापूर्ति कर रहा है।
नगर पालिक निगम: सालों से सिर्फ सर्वे कर रहा है। सर्वे की फाइलें मोटी हो रही हैं, सड़कें खून से लाल।
प्रशासन के आला अधिकारी: AC कमरों में बैठकर सड़क सुरक्षा सप्ताह पर बड़े-बड़े लेक्चर दे रहे हैं, संगोष्ठी कर फोटो खिंचवा रहे हैं।
जमीनी हकीकत से इनका कोई लेना-देना नहीं।
आज पूरे जिले को तलाश है – क्या जिले में कोई माई का लाल ईमानदार अधिकारी बचा है, जो इस सड़ी हुई, भ्रष्ट और निकम्मी व्यवस्था से शहर को मुक्ति दिला सके ? जो इन यमराज बने डिवाइडरों को उखाड़कर, सड़कों से लोहे की कीलों के भ्रष्टाचार को खत्म कर, जनता को सुरक्षित सफर दे सके ?
जब तक जवाब नहीं मिलता, तब तक छिंदवाड़ा की सड़कें यूं ही मौत बांटती रहेंगी।