सत्ता के गलियारों में महामंथन: 4 राज्यों में ‘चेहरा’ बदलने की तैयारी में भाजपा ..?
भारतीय राजनीति में जब खामोशी छाती है, तो वह अक्सर किसी बड़े ‘सियासी तूफान’ की पूर्वपीठिका होती है। हालिया उपचुनावों के नतीजों और सत्ता के गलियारों से छनकर आ रही खबरों पर यदि पैनी दृष्टि डाली जाए, तो यह स्पष्ट सुगबुगाहट है कि भारतीय जनता पार्टी आगामी समय में अपने शासित पांच राज्यों में बड़ा ‘नेतृत्व परिवर्तन’ कर सकती है। जानकारों सूत्रों के मुताबिक , मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में मुख्यमंत्रियों की कुर्सी पर तलवार लटक रही है।
विश्लेषणात्मक रिपोर्ट : राकेश प्रजापति
भाजपा अपने ‘निर्मम’ और ‘व्यावहारिक’ निर्णयों के लिए जानी जाती है। पार्टी के लिए सत्ता का अर्थ केवल राज करना नहीं, बल्कि अगले चुनाव की जमीन तैयार करना है। ऐसे में यह समझना अत्यंत प्रासंगिक है कि पूर्ण बहुमत वाली सरकारों में आखिर नेतृत्व परिवर्तन की नौबत क्यों आ रही है और इस राजनीतिक संकट का निवारण क्या है ?
मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में डॉ. मोहन यादव को कमान सौंपना एक बड़ा ओबीसी दांव था। परंतु वर्तमान में सरकार और संगठन के बीच गहराती खाई चिंता का विषय है। विधायकों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों में भारी आक्रोश है कि नौकरशाही उनकी बात नहीं सुनती। मुख्यमंत्री का यह दावा कि “सबकी सुनी जा रही है” जमीनी हकीकत से मेल नहीं खा रहा। इसके अतिरिक्त, सवर्णों और ओबीसी वर्ग के बीच बढ़ता तनाव भाजपा के मूल वोटबैंक में सेंध लगा रहा है। आगामी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले जनता में पनपता यह रोष पार्टी को बदलाव के लिए विवश कर रहा है। तभी डेमेज कंट्रोल करने के लिए मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान की शुरुवात करनी पड़ी ,इसके बहाने जनता के मूड को भांपा जा सके
छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने आदिवासी समुदाय को एक मजबूत संदेश दिया था। लक्ष्य पूरा हो चुका है, लेकिन साय की सहज और सरल छवि पार्टी के लिए अब एक राजनीतिक दुर्बलता बन रही है। पार्टी को यह आभास हो गया है कि आगामी चुनावों में कांग्रेस के दिग्गज नेता भूपेश बघेल के आक्रामक राजनीतिक कौशल का सामना करना विष्णुदेव साय के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण होगा। वहां एक ऐसे नेतृत्व की दरकार है जो विपक्ष की हर चाल का मुखरता से जवाब दे सके।
उत्तराखंड: उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी अपने नेतृत्व में चुनाव जिताने में सफल रहे, लेकिन स्वयं का चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद आलाकमान ने उन पर पुनः विश्वास जताया ताकि वे कमियों को सुधार सकें। परंतु, प्रशासनिक कामकाज को लेकर जनता और काडर में पनपती नाराजगी यह संकेत दे रही है कि वह अवसर शायद भुनाया नहीं जा सका है। यह असंतोष कहीं पार्टी के लिए घातक ना बन जाए, इसलिए बदलाव की पटकथा लिखी जा रही है।
ओडिशा: ओडिशा में नवीन पटनायक के अभेद्य किले को ढहाने के बाद, भाजपा ने मोहन चरण माझी को सत्ता सौंपकर एक नया प्रयोग किया था। हालांकि, शुरुआती योजना किसी अन्य दिग्गज (जैसे सिंहदेव) को कमान सौंपने की थी। अब पार्टी यह महसूस कर रही है कि ओडिशा जैसे जटिल और नव-विजित राज्य को संभालने के लिए जिस राजनीतिक परिपक्वता और मजबूत पकड़ की आवश्यकता है, उसमें वर्तमान नेतृत्व खरा नहीं उतर पा रहा है।
भाजपा का भावी ‘कोर्स करेक्शन’
इन कारणों से स्पष्ट है कि भाजपा नेतृत्व के लिए अब केवल चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं है; सुशासन, सामाजिक सामंजस्य और प्रशासनिक नियंत्रण भी उतना ही अनिवार्य है। इस स्थिति से निपटने के लिए भाजपा निम्नलिखित निवारणात्मक कदम (Course Correction) उठा सकती है:
मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में जहां 2003 से ओबीसी नेतृत्व का फॉर्मूला चल रहा है, वहां अब एक नई ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की आवश्यकता है। सवर्णों और ओबीसी के बीच बढ़ती दरार को पाटने के लिए पार्टी एक ऐसा ‘सर्व-स्वीकार्य’ नया चेहरा सामने ला सकती है, जो जातिगत खाइयों को पाट सके और जिसके नेतृत्व में दोनों वर्ग सुरक्षित महसूस करें।
नौकरशाही के बेलगाम होने की शिकायतों का एकमात्र निवारण एक ‘मजबूत और प्रशासनिक क्षमता वाले’ मुख्यमंत्री की नियुक्ति है। ऐसा नेतृत्व जो विधायकों और कार्यकर्ताओं के सम्मान की रक्षा कर सके और प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए। पार्टी ऐसे चेहरों को तरजीह देगी जिनकी पकड़ फाइलों और फील्ड, दोनों पर हो।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जहां विपक्ष मजबूत है, वहां रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक नेतृत्व की दरकार है। निवारण के रूप में आलाकमान ऐसे चेहरों को प्रोजेक्ट करेगा जो जन-संवाद में माहिर हों और विपक्षी नैरेटिव को उसी की भाषा में ध्वस्त करने की क्षमता रखते हों।
सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इन्कंबेंसी) को रोकने का सबसे कारगर तरीका चुनाव से कम से कम डेढ़-दो साल पहले नेतृत्व बदल देना है, ताकि नए मुख्यमंत्री को अपनी कार्यशैली स्थापित करने और जनता की नाराजगी दूर करने का पर्याप्त समय मिल सके।
राजनीति में कोई भी प्रयोग अंतिम नहीं होता। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भली-भांति जानता है कि समय के साथ बदलते समीकरणों के अनुरूप यदि मोहरे नहीं बदले गए, तो बाजी हाथ से निकल सकती है। राज्यों में संभावित नेतृत्व परिवर्तन कोई प्रशासनिक अस्थिरता नहीं, बल्कि भाजपा की उस ‘निर्मम कार्यशैली’ का परिचायक है, जिसमें व्यक्ति से ऊपर ‘पार्टी और सत्ता की निरंतरता’ को रखा जाता है। आने वाले कुछ महीने भारतीय राजनीति में बड़े फैसलों और चौंकाने वाले चेहरों के गवाह बन सकते हैं।