मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान: सुशासन की पहल या पुरानी व्यवस्थाओं का फेल्योर ?

‘मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान’ – सुशासन की नई पहल या पुरानी व्यवस्थाओं की विफलता का परिणाम ?

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा छिंदवाड़ा जिले में 7 अगस्त से “मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान 2026” की शुरुआत की जा रही है। जगह-जगह लगे होर्डिंग्स  यह दावा कर रहे हैं कि यह अभियान “सुशासन, संवाद और समाधान की ओर एक कदम” है। लेकिन इस चकाचौंध भरे अभियान के पीछे एक बड़ा और कड़वा सवाल छिपा है: आखिर सरकार को इस नए अभियान को शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ी ? क्या मौजूदा प्रशासनिक ढांचा जनता की समस्याओं को सुलझाने में विफल हो चुका है ? आइए इस अभियान की पृष्ठभूमि और इसके उद्देश्यों का विश्लेषण करें।

✍️ विश्लेषणात्मक रिपोर्ट:राकेश प्रजापति 

1. अभियान की आवश्यकता क्यों ? 

आम जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब पहले से ही शिकायत निवारण तंत्र मौजूद हैं, तो इस नए अभियान की क्या आवश्यकता है। इसके पीछे की जमीनी हकीकत कुछ इस प्रकार है:

* मंगलवार जनसुनवाई की विफलता: हर मंगलवार को होने वाली जनसुनवाई में दूर-दराज के गांवों से लोग किराया खर्च करके, अपनी दिहाड़ी छोड़कर जिला मुख्यालय पहुंचते हैं। लेकिन अक्सर अधिकारियों की अनुपस्थिति या महज ‘आश्वासन’ की पर्ची थमा दिए जाने से वे निराश और असंतुष्ट लौटते हैं। जनसुनवाई कई बार समस्याओं के समाधान के बजाय केवल रस्म अदायगी (स्वांग) बनकर रह गई है।

* लोक सेवा केंद्रों में निराशा: लोक सेवा केंद्रों का गठन समय-सीमा में सेवाएं देने के लिए किया गया था। लेकिन हकीकत यह है कि निर्धारित शुल्क चुकाने के बाद भी आम जन को चक्कर काटने पड़ते हैं और सेवाएं समय पर नहीं मिलतीं।

* भरोसे का संकट: जनता का मौजूदा सिस्टम से भरोसा उठ चुका है। यही कारण है कि सरकार को इस नए अभियान का नाम ही “जन-विश्वास अभियान” (जनता का विश्वास, सरकार का प्रयास) रखना पड़ा है, ताकि खोए हुए भरोसे को वापस पाया जा सके।

2. क्या नई व्यवस्था से पुरानी “खिड़कियां” बंद हो जाएंगी?

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु है कि क्या मुख्यमंत्री के इस अभियान के बाद मंगलवार की जनसुनवाई या लोक सेवा केंद्रों जैसी मौजूदा व्यवस्थाएं (खिड़कियां) बंद कर दी जाएंगी?

अभियान के बैनर का गहराई से विश्लेषण करने पर इसका उत्तर “नहीं” में मिलता है। यह अभियान पुरानी खिड़कियों को बंद करने के लिए नहीं, बल्कि उन खिड़कियों पर लगे ‘जंग’ को साफ करने के लिए लाया गया है।

  • बैनर में स्पष्ट रूप से लिखा है: “सीएम हेल्पलाइन एवं लोक सेवा गारंटी के लंबित प्रकरणों का त्वरित निराकरण।”

  • इसका सीधा अर्थ है कि सरकार खुद स्वीकार कर रही है कि लोक सेवा गारंटी और सीएम हेल्पलाइन में शिकायतों का अंबार (Pending cases) लगा हुआ है। यह अभियान उन पुरानी पेंडेंसी को क्लियर करने का एक ‘क्रैश कोर्स’ या विशेष ड्राइव है, न कि पुरानी व्यवस्थाओं का विकल्प।

3. ‘जन-विश्वास अभियान’ में नया क्या है ?

इस अभियान के तहत सरकार कुछ नए दृष्टिकोण अपना रही है, जो इसे नियमित जनसुनवाई से अलग बनाते हैं:

* शुक्रवार जनसंवाद: मंगलवार की जनसुनवाई के अलावा, अब हर शुक्रवार को अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में आमजन से सीधा संवाद (जनसंवाद) किया जाएगा।

*अधिकारियों की जवाबदेही: “जनता की समस्याएं, सरकार का समाधान” नारे के साथ सरकार यह संदेश देना चाहती है कि अब समस्या का समाधान करना सीधे तौर पर प्रशासन की जिम्मेदारी होगी।

*योजनाओं की जमीनी समीक्षा: ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में सेवाओं की गुणवत्ता का परीक्षण किया जाएगा और पात्र हितग्राहियों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने पर जोर दिया जाएगा।

“मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान 2026” इस बात का स्पष्ट प्रशासनिक स्वीकारोक्ति (Admission) है कि निचले स्तर पर लालफीताशाही, लोक सेवा केंद्रों की लापरवाही और सीएम हेल्पलाइन में शिकायतों के लंबित रहने से जनता में असंतोष पनपा है।

यह अभियान पुरानी व्यवस्थाओं को बंद करने का ऐलान नहीं है, बल्कि उस लकवाग्रस्त हो चुकी व्यवस्था में ‘करंट’ दौड़ाने का प्रयास है। यदि हर शुक्रवार का जनसंवाद भी मंगलवार की जनसुनवाई की तरह सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह गया, तो यह अभियान भी केवल होर्डिंग्स तक सिमट कर रह जाएगा। असली सुशासन तभी आएगा जब बिना किसी विशेष ‘अभियान’ के, आम आदमी की शिकायत लोक सेवा केंद्र या नियमित जनसुनवाई में पहली ही बार में सुन ली जाए।