दतिया का दहन: ‘ जयचंदों’ की तलाश और क्या बलि चढ़ेंगे पार्टी के ‘संकटमोचक’?

सत्ता के अहंकार और भितरघात ने ढहाया भाजपा का दुर्ग। किन ‘जयचंदों’ पर गिरेगी गाज और नरोत्तम मिश्रा का अब क्या होगा ? 

सियासत की बिसात पर जब सत्ता का गुरूर सिर चढ़कर बोलने लगता है, तो जनता बैलेट बॉक्स से वह तमाचा जड़ती है जिसकी गूंज सीधे दिल्ली के गलियारों तक सुनाई देती है। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजे महज एक चुनावी हार नहीं हैं; यह भारतीय जनता पार्टी के उस ‘अजेय तिलिस्म’ का चकनाचूर होना है, जिसे 14 मंत्रियों, 6 सांसदों और 110 मौजूदा और पूर्व विधायकों की भारी-भरकम फौज का ‘पावर-शो’ भी ढहने से नहीं बचा सका। सच तो यह है कि कांग्रेस ने यह चुनाव जीता कम है, भाजपा ने अपने ही बोए हुए अंतर्कलह और भितरघात के कांटों से इसे हारा ज्यादा है।

त्वरित टिप्पणी: राकेश प्रजापति

‘पावर-शो’ का मर्सिया और शहरी दुर्ग में बगावत दतिया का रण कोई आम उपचुनाव नहीं था; यह पूरी राज्य सरकार और संगठन की साख का प्रश्न था। लेकिन 6000 से अधिक वोटों की शिकस्त ने भाजपा की रणनीतिक कलई खोल दी है। सबसे भयानक झटका ग्रामीण अंचलों से नहीं, बल्कि उस ‘शहरी दुर्ग’ से लगा है जिसे भाजपा अपनी अघोषित पैत्रिक संपत्ति समझती थी। जिस मध्यम वर्ग और विकास के नाम पर भगवा दल छाती ठोकता है, उसी कोर वोटर ने पार्टी की नाभि में तीर मारा है। यह हार चीख-चीख कर ऐलान कर रही है कि जनता अब वातानुकूलित कमरों में लिए गए थोपे हुए फैसलों को बर्दाश्त करने के मूड में कतई नहीं है।

‘जयचंदों’ की तलाश: हार की बौखलाहट अब छटपटाहट में बदल चुकी है। मुख्यमंत्री आवास में हुए मंथन के बाद ‘जयचंदों’ को तलाशने की कवायद तेज हो गई है। गौरव रणदिवे और अंबाराम कराड़ा की दो सदस्यीय समिति का गठन पार्टी के भीतर मचे हाहाकार का सीधा प्रमाण है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का सख्त लहजा बता रहा है कि अनुशासन का चाबुक चलने वाला है और दतिया की पूरी जिला इकाई, पार्षदों और मोर्चों पर गाज गिरना लगभग तय है। लेकिन क्या महज़ कुछ प्यादों की गर्दन काटकर रणनीतिकार अपनी कुर्सी की जवाबदेही से बच पाएंगे?

क्या ‘संकटमोचक’ के राजनीतिक सफर पर लगेगा पूर्ण विराम ? पर्दे के पीछे की सबसे खौफनाक और अचंभित करने वाली राजनीतिक पटकथा नरोत्तम मिश्रा को लेकर लिखी जा रही है। वो चेहरा, जो कभी भाजपा के लिए सरकारें बनाने और बचाने वाले ‘संकटमोचक’ के तौर पर पूजा जाता था, आज अपनी ही पार्टी में अपने वजूद की आखिरी लड़ाई लड़ रहा है। सूत्रों की मानें तो इस ऐतिहासिक फजीहत का पूरा ठीकरा उसी ‘संकटमोचक’ के सिर फोड़ने की तैयारी हो चुकी है और एक गोपनीय रिपोर्ट दिल्ली दरबार भेजी जा रही है। कल तक दूसरों के लिए रणनीति का जाल बुनने वाला नेता आज खुद शिकारगाह में खड़ा है। जब पार्टी का खेवनहार ही अपनी नैया डूबने से न बचा पाए, तो समझ लीजिए कि संगठन की नींव में दीमक कितनी गहरी लग चुकी है।

युवा, किसान और ‘मैं ही पार्टी हूँ’ का अहंकार भाजपा हार का ठीकरा चाहे जिस व्यक्ति पर फोड़ ले, लेकिन जमीनी हकीकत बहुत तल्ख है। दतिया का परिणाम केवल एक गुट के भितरघात का नतीजा नहीं है। यह उन भटके हुए युवाओं का आक्रोश है और सड़कों पर मूंग की फसल लेकर खड़े उस बेहाल किसान का धधकता हुआ गुस्सा है, जिसकी आवाज भोपाल के सत्ताधीशों तक नहीं पहुंचती। यह चुनाव नेतृत्व को एक कड़ा संदेश है कि आप स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावनाओं को कुचलेंगे, मनमर्जी से किसी पर भी फैसले लादेंगे और ‘हमेशा जीतने के नशे’ में चूर रहेंगे, तो जनता आपको जमीन सुंघा देगी।

दतिया के उपचुनाव ने मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर खतरे का लाल सायरन बजा दिया है। यह आग 2028 के विधानसभा चुनावों के लिए किसी सुनामी से कम नहीं है। अनुशासन के नाम पर आप कितनी भी कार्रवाइयां कर लें, ‘जयचंद’ ढूंढकर उन्हें सस्पेंड भी कर दें, लेकिन जब ‘सत्ता का अहंकार’ देवतुल्य कार्यकर्ताओं और जनता की आंखों में खटकने लगे, तो कोई भी दंडात्मक कार्रवाई संजीवनी नहीं बन सकती।

भाजपा को अब यह तय करना होगा कि वह इस करारी हार से सबक लेकर अपने गिरेबान में झांकने का साहस जुटाती है, या फिर ‘बलि के बकरे’ ढूंढकर अपने अहंकारी और आत्मघाती फैसलों पर पर्दा डालना ही अपनी नियति मानती है। आग लग चुकी है, यदि इसे फौरन नहीं बुझाया गया, तो दतिया की यह चिंगारी पूरे प्रदेश के सियासी नक्शे को झुलसाने का पूरा माद्दा रखती है।