मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञान प्रभा’
ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 1५ वी कड़ी ..
द्वितीयोऽध्यायः – ‘सांख्य-योग’
‘सांख्य सिद्धान्त और योग का अभ्यास’
श्लोक (८,९,१०)
जो देख परिजनों को, मन में उत्पन्न हुआ है शोक गहन,
कर सकता है उपदेश आपका ही, उसके प्रभाव को कम ।
पृथ्वी का सारा राज्य मिले, या मिले भले ही इन्द्रासन,
हो पायेगा प्रभु दूर नहीं, यह मोह बसा जो मेरे मन ।
हो भूमि भली पर भुने बीज डालें उसमें क्या ऊगेंगे?
हो चुकी आयु पूरी, वे परमामृत सिवाय क्या जीवेंगे?
सम्पत्ति मिले या राजभोग, होगा न मोह से छुटकारा,
हो कृपा कृपानिधि, मिल जाए प्रसाद तो हटे क्षोभ सारा ।
इस भाँति भ्रान्ति अल्पावधि को जब दूर हुई, अर्जुन बोला,
लेकिन तुरंत हो गया मोह से ग्रसित और वह फिर बोला ।
कहते है युद्ध करूँ, आखिर परिणाम युद्ध का क्या होगा?
जीतूंगा तो सारी पृथ्वी का राज्य अकण्टक भोगूँगा ।
पृथ्वी का क्या यदि देव लोक का भी पाऊँ, सुख भोग सभी,
तो भी जो शोक समाया है, हो नहीं सकेगा दूर कभी ।
भगवन न युद्ध के लिए कहें, मैं युद्ध नहीं कर सकता हूँ,
होगा अनर्थ इससे भारी, मैं पातक इसे समझता हूँ ।
वह लहर मोह की नहीं, स्यात था डंक काल के विषधर का,
जिसका उपचार सिवाय सपेरे कृष्ण चन्द्र के क्या मिलता ?
ज्यों आतप में पर्वत झुलसे, अर्जुन भी दुख से झुलस गया।
जब तक न मेह भरते नभ से, पर्वत होता क्या हरा-भरा ?
घनश्याम करेंगे शान्त अगन, नव अंकुर आयेंगे वन में,
अर्जुन का होगा शोक दूर, ज्ञानांकुर फूटेंगे मन में
इतना सम्वाद सुनाया संजय ने, फिर आगे और कहा,
की प्रगट अनिच्छा अर्जुन ने, अरु धारण करके मौन रहा।
देखी यह दशा कृष्ण ने तो, आश्चर्य हुआ उनको भारी
किस तरह कुबुद्धि ने जकड़ रखी है, अर्जुन की सन्मति सारी ।
करने विचार वे लगे कि, कैसे धैर्य करेगा यह धारण ?
कैसे विकार कर सके दूर, जो ग्रसित मोह से इसका मन ?
ज्यो मान्त्रिक पंचाक्षरी विचार करता, पिशाच-बाधा हरने,
या कठिन रोग के लिए वैद्य करता, विचार विधि तय करने ।
करते विचार श्री कृष्ण, मोह अर्जुन का हो किस तरह दूर,
अज्ञान रहा कारण इसका, वह भूल गया निज आत्मरुप ।
माँ के जैसा गुस्सा माधव ने, तब अर्जुन को दिखलाया,
कुछ कठोर पर हितकर वचनों से, अर्जुन को समझाया।
भले दवा हो कडुवी लेकिन, अमरित निहित भलाई का,
सेनाओं के बीच कृष्ण का, अर्जुन को प्रबोध चलता । क्रमशः ….