4 घंटे चला रेस्क्यू ऑपरेशन: ग्रीन मेट के जरिए कुएं से निकाला गया

प्रकृति के रंगमंच पर हर जीव का अपना एक खास किरदार है। सियार जिसे अक्सर कहानियों में केवल चालाकी का प्रतीक मान लिया जाता है, असल में हमारे पारिस्थितिक तंत्र (ecosystem) का एक बेहद महत्वपूर्ण ‘सफाईकर्मी’ है। यह पर्यावरण से सड़े-गले अवशेषों को हटाकर महामारियों को फैलने से रोकता है और जंगल की खाद्य श्रृंखला का संतुलन बनाए रखने में एक अहम भूमिका निभाता है।

गुरुवार की सुबह, यहीं हमारे छिंदवाड़ा के सांवरी परिक्षेत्र अंतर्गत मोहखेड़ के ग्राम जरोंद में, प्रकृति की इसी महत्वपूर्ण कड़ी की जान सांसत में आ गई थी। एक किसान के गहरे कुएं में एक सियार जा गिरा। यह घटना सिर्फ एक जानवर के कुएं में गिरने की नहीं थी, बल्कि जंगल के उस नाजुक संतुलन को बचाने की चुनौती थी। यहाँ प्रस्तुत है उस पूरे घटनाक्रम का एक जीवंत आँखों देखा हाल..

कुएं की गहराई और जीवन की जद्दोजहद

जैसे ही जरोंद गाँव से यह खबर सांवरी वन परिक्षेत्र अधिकारी कीर्ति बाला गुप्ता जी तक पहुँची, वन विभाग की टीम ने बिना वक्त गवाएं मोर्चा संभाल लिया। मौके पर पहुँचकर देखा तो कुएं के ठंडे पानी और अंधेरे के बीच वह वन्यजीव अपनी जान बचाने के लिए बुरी तरह हांफ रहा था।

रेस्क्यू ऑपरेशन के अहम पड़ाव:

  • रणनीति और पहला प्रयास: वन विभाग की टीम के जांबाज सदस्यों—डिप्टी रेंजर पवन ढेपे, शिवप्रसाद भलावी, पियूष बेले और राजेश दाढ़े—ने सबसे पहले देसी जुगाड़ का सहारा लिया। सियार को बाहर निकालने के लिए एक ‘लकड़ी का मचान’ तैयार कर कुएं में उतारा गया। योजना थी कि सियार उस पर चढ़ जाएगा और उसे खींच लिया जाएगा। डरा और सहमा हुआ सियार उस मचान को समझ नहीं पाया। यह प्रयास विफल रहा। समय बीत रहा था, भीड़ की उत्सुकता बढ़ रही थी और कुएं के अंदर उस बेजुबान की ताकत जवाब दे रही थी।

  • नई तरकीब (ग्रीन मेट का प्रयोग): जब सीधा तरीका काम नहीं आया, तो टीम ने एक नई और सुरक्षित रणनीति अपनाई। ‘ग्रीन मेट’ (हरे जाल/चटाई) को कुएं में बड़ी ही सावधानी से उतारा गया। यह सियार के लिए मचान के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित और पकड़ने में आसान था। पूरे चार घंटे तक चली इस कड़ी मशक्कत, टीम के असीम धैर्य और सूझबूझ के बाद, अंततः उस सियार को ग्रीन मेट के सहारे सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।

कुएं से बाहर आते ही जब वह सियार अपने प्राकृतिक आवास की ओर दौड़ा, तो वहां खड़े हर इंसान और मानो खुद प्रकृति ने एक गहरी राहत की सांस ली। वन विभाग की इस टीम का यह चार घंटे का संघर्ष सिर्फ एक ‘रेस्क्यू’ नहीं था; यह पर्यावरण के प्रति हमारी उस जिम्मेदारी का प्रमाण था, जो यह सिखाती है कि धरती के पारिस्थिकीय संतुलन को बनाए रखने के लिए हर एक जीव का जीवित रहना अनमोल है।

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