‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक ..45

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 45 वी कड़ी ..

चतुर्थोऽध्यायः – ज्ञान योग

दिव्य ज्ञान का योग, ज्ञान-कर्म-सन्यास योग “याने ज्ञान और कर्म के सच्चे -त्याग का योग 

श्लोक (१)

मन और इन्द्रियाँ वश में हों, तब कर्मयोग सधता अर्जुन,

तब मन को बुद्धि नियंत्रित कर, करती है मनसिज का मर्दन ।

पालन स्वधर्म का करने से ही, होता है इसका पालन,

यह सबसे पहिले विवस्वान, के द्वारा किया गया धारण ।

 

है अविनाशी यह कर्मयोग, सूरज को इसे दिया मैंने,

अपने सुत वैवस्वत मनु को, फिर कहा योग यह सूरज ने ।

मनु ने उसका आचरण किया अरु अपने सुत को सिखलाया,

इक्ष्वाकु हुए राजा प्रसिद्ध, क्षत्रिय कुल जिनसे यश पाया ।

श्लोक (२)

यह रहा राजऋषियों तक क्रम, फिर परम्परा यह टूट गई,

पृथ्वी पर क्षीण हुई आगे, लगभग अब है यह लुप्त हुई ।

इसको न समझने वाले अब, इसलिए लोप इसका अर्जुन,

आसक्ति भोग की बढ़ने से, इस कर्मयोग का हुआ क्षरण ।

 

रुचि आत्मबोध की नहीं रही, तन के प्रधान हो जाने पर,

रह सकी न आस्तिक बुद्धि बची, रुचि विषयों की बढ़ जाने पर ।

क्या भरी सभा में बहरों की, संगीत प्रतिष्ठा पाता है?

या राका पति का क्या प्रकाश, गीदड़ के दल को भाता है?

श्लोक (३)

अति उत्तम यह रहस्य अर्जुन, यह योग पुरातन गोपनीय,

तू मेरा प्यारा भक्त रहा, तेरी है व्यथा निवारणीय ।

यह मैंने तुझसे आज कहा, शंका न तनिक भी मन में ला,

कल्याण प्राप्ति के लिए पार्थ, तू उठ अपना कर्तव्य निभा ।

श्लोक (४)

अर्जुन उवाच :-

हे कृपासिन्धु, स्वाभाविक ही माँ का बच्चे पर प्रेम रहा,

प्रभु प्रेम तुम्हारा ताप-दग्ध, मानव-जग को तरु छाँह रहा ।

हम कैसे कर पायें भगवन, गुणगान तुम्हें सम्मुख पाकर,

उठ रहा प्रश्न कैसे पूछें, रह जाता है मन सकुचा कर ।

 

हे वासूदेव उत्पत्ति सूर्य की, सृष्टि सृजन के पूर्व हुई,

सिखलाया रवि को कर्मयोग यह बात आपने अभी कही ।

यह कैसा असमञ्जस भगवन, है जन्म आपका इस युग का,

यह कथन असत्य न हो सकता पर नहीं तर्क संगत लगता ।

श्लोक (4.5)

श्री भगवानुवाच :-

सन्देह न कर अर्जुन, मैंने ही सूरज को उपदेश दिया,

इसमें अचरज की बात नहीं, यह नहीं असम्भव काम किया।

हो चुके बहुत-से जन्म परन्तप मेरे और तुम्हारे भी,

तुमको है उनका पता नहीं, पर मुझको मेरे ज्ञात सभी

श्लोक (६)

वह रहा कल्प का आदि कि जब नारायण रूप रहा मेरा

वैजल में था, जल ही जल का, मानो तब था मुझ पर घेरा।

तब से कितने ही रूपों में, हो चुका प्रगट मैं हे अर्जुन,

मैं मत्स्य रहा, मैं ही कच्छप, बाराह, नृसिंह में ही वामन ।

 

मैं कालातीत रहा, फिर भी तीनों कालों का मुझे ज्ञान,

ये भेद काल के जग के हैं, मेरा है केवल वर्तमान ।

सर्वज्ञ, अजन्मा, अविनाशी होकर भी ईश्वर हूँ जग का,

साधारण व्यक्ति सरीखा मै, लेता हूँ जन्म और मरता ।

 

अपने आधीन प्रकृति को कर ले अपने साथ योग माया,

होता अवतरित धरा पर मैं जग भेद नहीं करने पाया ।

तजता मैं नहीं अमूर्त रूप माया के रूप रहे सारे ।

अभिनेता जैसा रूप बदल करता हूँ मैं अभिनय सारे, क्रमशः…