‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 136 ..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा‘ धारावाहिक की 136 वी कड़ी ..

                       द्वादशोऽध्यायः – ‘भक्तियोग’

 ‘व्यक्तिक भगवान की पूजा, परमब्रह्म की उपासना की अपेक्षा अधिक अच्छी है’

श्लोक  (१२)

हे पार्थ व्यर्थ अभ्यास रहा, यदि नहीं मर्म को समझ सके,

लेकिन अभ्यास योग से बढ़कर, योग ज्ञान का श्रेष्ठ रहे ।

पर ज्ञान योग से बढ़कर है, मुझ परमेश्वर का ध्यान योग,

जिससे बढ़कर सबसे ऊपर, कर्मो के फल का त्याग योग ।

 

पाता है परम शांति त्यागी, यह रहा योग का फल अर्जुन,

जब तक आसक्ति रहे फल में, होता न लाभ उतना अर्जुन ।

ममता आसक्ति कामना का, होता जब त्याग, शान्तिआती,

मूरत प्रभु की जाग्रत होती, अन्तस में छिपी न रह पाती ।

 

निश्चय ही ज्ञानयोग अर्जुन, अभ्यास योग से अधिक भला,

अरु ध्यान ज्ञान से बढ़कर है, रे त्याग, ध्यान से रहा बड़ा ।

पाता है त्यागी परम शान्ति, हे भक्ति ज्ञान से अधिक भली,

उससे भी बढ़कर रहा कर्म, जिसमें न लालसा शेष रही ।

 

ये भक्ति ज्ञान अभ्यास योग, रे क्रमश: कठिन कठिनतर हैं,

कर्मो के फल का त्याग सुगम, साधन ये सारे दुष्कर हैं।

कारण अशान्ति के दूर करे, कर्मों के फल का त्याग भाव,

आध्यात्मिक सुख पाता साधक, गहराता प्रभु के प्रति लगाव ।

 

हे पार्थ व्यर्थ अभ्यास रहा, यदि मर्म न इसका जान सके,

अभ्यास योग से साधन ये, रे योग ज्ञान का श्रेष्ठ रहे ।

मुझ परमेश्वर का ध्यान योग, है ज्ञान योग से भी बढ़कर,

कर्मो के फल का त्याग योग, होता पर सबसे चढ़ बढ़कर ।

 

अपने पथ पर साधक बढ़ता, वह ज्ञान हेतु अनुशीलन कर,

रे ध्यान ज्ञान से श्रेष्ठ रहा, अतएव ध्यान का पालन कर ।

पर ध्यान योग से भी उत्तम, कर्मो के फल का त्याग पार्थ,

मिलती है मन को शांति परम, जब त्याग भाव आए यथार्थ ।

 

हे अर्जुन, अंगभूत साधन, ये भक्ति भाव के बतलाए,

इनके आश्रय से भक्त मुझे, साक्षात करे अरु पा जाए ।

पाते जो प्रेमी भक्त मुझे, बतलाता हूँ उनके लक्षण,

जिसे जिज्ञासा जाग रही, उत्सुक हो आया तेरा मन । क्रमशः….