छिंदवाड़ा के जांबाज वनरक्षकों को भोपाल में मिला सर्वोच्च सम्मान, पर कुछ नाम क्यों छूटे ?

जब मौत से आंखें मिलाकर जीता गया प्रदेश का सर्वोच्च गौरव… छिंदवाड़ा के जांबाजों को भोपाल में मिला वन विभाग का सर्वोच्च सम्मान..

अदम्य साहस, फौलादी इरादे और जंगलों की रक्षा के लिए अपनी जान दांव पर लगा देने वाले छिंदवाड़ा के जांबाज वनकर्मियों के पराक्रम की गूंज आज पूरे मध्यप्रदेश में सुनाई दे रही है। १ नवंबर, मध्यप्रदेश स्थापना दिवस के पावन अवसर पर राजधानी भोपाल स्थित वन मुख्यालय में छिंदवाड़ा के दो रणबांकुरों- शैलेन्द्र वाडीवार और पंकज सोनी को वन विभाग के सबसे प्रतिष्ठित और सर्वोच्च अलंकरण ‘प्रशंसा चक्र एवं प्रशंसा पत्र’से नवाजा गया ।

यह कोई साधारण पुरस्कार नहीं है; यह खाकी वर्दी और वन सेवा के इतिहास का वह सबसे बड़ा सम्मान है जो किसी वनकर्मी या अधिकारी को उसके पूरे सेवाकाल में जीवन में केवल एक बार ही नसीब होता है। इस सर्वोच्च सम्मान ने न केवल छिंदवाड़ा जिले का सीना गर्व से चौड़ा किया है, बल्कि पूरे प्रदेश में इन वीर रक्षकों के पराक्रम का परचम लहरा दिया है।

✍️ राकेश प्रजापति 

उस खौफनाक रात की दास्तान: जब काल के जबड़े में डाला गया हाथ..

यह सम्मान किसी मेज पर बैठकर नहीं, बल्कि घने बीहड़ों, अंधेरी रातों और खूंखार शिकारियों की बंदूकों के साए में लिखा गया था। राष्ट्रीय पशु बाघ के बेरहम शिकारियों और करोड़ों के अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट को नेस्तनाबूद करने के लिए रची गई वह योजना रोंगटे खड़े कर देने वाली थी।

बिना किसी आधुनिक हथियार के, नकली नोटों की गड्डियों के सहारे तस्करों के बीच अंडरकवर उतरना और पलक झपकते ही काल बन चुके शिकारियों को उन्हीं के जाल में घेर लेना—यह करिश्मा सिर्फ असाधारण हौसले और शीर्ष अधिकारियों के सटीक मार्गदर्शन से ही संभव था। सांवरी और परासिया के जंगलों से लेकर करेली के बीहड़ों तक चली इस मुहिम में इन जांबाजों ने साबित कर दिया कि वर्दी का फर्ज उनकी जान से भी बढ़कर है।

सफलता के पीछे का मार्गदर्शन और संयुक्त संघर्ष ..

इस ऐतिहासिक कामयाबी की पटकथा उच्चाधिकारियों की रणनीतिक सूझबूझ और मातहतों के अटूट तालमेल से रची गई। पूर्व वन मंडल के एसडीओ अनादि बुधौलिया और सांवरी रेंजर कीर्तिबाला गुप्ता के मजबूत बैकअप व दिशा-निर्देशन ने इस खतरनाक मिशन को धार दी। इसी सटीक प्लानिंग का परिणाम रहा कि देश के सबसे बेरहम वन्यजीव तस्कर आज सलाखों के पीछे अपनी करतूतों का हिसाब दे रहे हैं।

एक कसक बाकी: क्या गुमनाम रह गए कुछ जांबाज ?

जहाँ एक ओर शैलेन्द्र वाडीवार और पंकज सोनी का यह सम्मान पूरे वन अमले को गौरवान्वित कर रहा है, वहीं वन महकमे के गलियारों में एक दबी हुई टीस भी तैर रही है। उसी खौफनाक ऑपरेशन में कंधे से कंधा मिलाकर मौत के मुंह में कूदने वाले साथी-लिंकन सिंह राठौर, फैज खान और राहुल शर्मा जैसे जांबाजों के नामों का इस सूची में न होना चर्चा का विषय बना हुआ है।

सवाल उठना लाजिमी है कि क्या फील्ड में अपनी जान हथेली पर रखकर चक्रव्यूह रचने वाले इन जांबाजों की बहादुरी की इबारत को मुख्यालय तक पहुंचाने में वनमंडलाधिकारी (DFO) या मुख्य वन संरक्षक (CCF) स्तर पर कोई चूक या अनदेखी हुई ?

लेकिन इतिहास गवाह है कि असली वीरों का कद किसी पदक का मोहताज नहीं होता। तमगे सीने पर सजें या न सजें, जब तक छिंदवाड़ा के जंगलों में हवाएं बहेंगी, इन जांबाजों के बुलंद हौसलों और उनकी दिलेरी को जंगल और अवाम हमेशा सलाम करती रहेगी। भविष्य के पन्नों पर उनके साहस की नई कहानियां अभी और दर्ज होना बाकी हैं।

प्रेरणा का अमर अध्याय ..

पदक व्यवस्था का एक हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन कर्तव्यनिष्ठा, अदम्य साहस और बेखौफ जज्बा इंसान के भीतर से निकलता है। भोपाल में गूंजी तालियों की गड़गड़ाहट ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब हौसले फौलादी हों, तो हर अंधेरे जंगल का सीना चीरकर न्याय की रोशनी लाई जा सकती है। छिंदवाड़ा के इन सपूतों को सलाम, जिन्होंने अपने खून-पसीने से जंगलों की सांसों को महफूज रखा है।