अमरवाड़ा में अफसरशाही बेलगाम: स्वतंत्रता दिवस पर आदिवासी जनप्रतिनिधि का सरेआम अपमान !

“सबका साथ” का खोखला दावा और अफसरशाही का नंगा नाच: स्वतंत्रता दिवस पर अमरवाड़ा में आदिवासी जनप्रतिनिधि का सरेआम अपमान !

क्या यही है ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ ? क्या भाजपा सरकार का यह लोकलुभावन नारा केवल चुनावी रैलियों और विज्ञापनों तक ही सीमित है? अमरवाड़ा से सामने आई एक बेहद शर्मनाक और विचलित करने वाली घटना ने इस दावे की धज्जियां उड़ा दी हैं। देश जब स्वतंत्रता दिवस के जश्न में डूबा था, तब अमरवाड़ा में अफसरशाही प्रोटोकॉल को जूतों तले रौंद रही थी। एक चुने हुए आदिवासी जनप्रतिनिधि का सरेआम, भरे मंच पर अपमान किया गया, और सत्ता के नुमाइंदे व प्रशासनिक अधिकारी मूकदर्शक बनकर इस गुंडागर्दी का तमाशा देखते रहे !

✍️  राकेश प्रजापति

लोकतंत्र के गाल पर तमाचा..

विधानसभा मुख्यालय अमरवाड़ा के स्टेडियम ग्राउंड में स्वतंत्रता दिवस समारोह पूरे सम्मान के साथ आयोजित किया गया था। इस गरिमामयी कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे अमरवाड़ा जनपद पंचायत अध्यक्ष, गणेश कंगाली। ध्वजारोहण के बाद, प्रोटोकॉल के तहत वे मुख्यमंत्री के संदेश का वाचन कर रहे थे। एक आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाले नेता होने के कारण शब्दों के उच्चारण में उन्हें थोड़ी असहजता हो रही थी, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र और आदिवासी समाज के स्वाभिमान पर सीधा प्रहार है।

अचानक जनपद सीईओ जयदेव शर्मा मंच पर आते हैं और किसी तानाशाह की तरह मुख्य अतिथि गणेश कंगाली के हाथ से संदेश का पन्ना छीन लेते हैं! उन्हें बेइज्जत कर किनारे कर दिया जाता है और एक नौकरशाह खुद माइक पर कब्ज़ा करके वाचन शुरू कर देता है। यह सिर्फ एक कागज़ छीनने की घटना नहीं थी; यह एक आदिवासी जनप्रतिनिधि के सम्मान, उसके संवैधानिक अधिकार और समूचे आदिवासी समाज की गरिमा का सरेआम चीरहरण था।

रक्षक ही बने मूकदर्शक: जमीर बेच चुके अधिकारी

जानकारों के मुताबिक इस पूरी घटना का सबसे काला अध्याय यह है कि मंच पर अमरवाड़ा विधायक कमलेश शाह, एसडीएम हेमकरण धुर्वे और एसडीओपी जैसी जिम्मेदार हस्तियां मौजूद थीं। जिन कंधों पर प्रोटोकॉल लागू करवाने और मुख्य अतिथि के सम्मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी थी, वे गूंगे-बहरे बनकर बैठे रहे !  मानो धृतराष्ट्र की सभा में द्रोपति का चीरहरण हो था रहा हो ..

जब माइक से आवाज़ बदली, तो मंच पर सन्नाटा छा गया। एसडीएम हेमकरण धुर्वे ने सीईओ को तत्काल रोकने के बजाय सिर झुकाकर मौन साध लेना ज्यादा उचित समझा। सवाल यह है कि क्या इन अधिकारियों की आंखों के सामने किसी सवर्ण या रसूखदार नेता का इस तरह अपमान करने की हिम्मत यह सीईओ जुटा पाता ?

भाजपा नेता का आक्रोश और बेलगाम अफसरशाही का अहंकार

गनीमत रही कि मंच पर मौजूद वरिष्ठ भाजपा नेता उत्तम ठाकुर ने इस तानाशाही के खिलाफ आवाज़ उठाई। उन्होंने एसडीएम और विधायक के सामने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई और प्रोटोकॉल की याद दिलाते हुए इस बेशर्मी को रुकवाया। श्री ठाकुर ने स्पष्ट कहा कि, “भाजपा की सरकार में आदिवासी जनप्रतिनिधि का अपमान सहन नहीं किया जाएगा। इसके लिए जो भी जिम्मेदार है उसके विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।”

लेकिन सत्ता के नशे में चूर अफसरशाही का अहंकार देखिए! इतनी बड़ी घटना के बाद, जहाँ इस सीईओ को अपनी ओछी हरकत पर सार्वजनिक माफी मांगनी चाहिए थी, वहीं प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जयदेव शर्मा जेब में हाथ डाले बेहद बेशर्मी से कार्यक्रम स्थल पर टहलते नजर आए। फोन करने पर जवाब देना भी उन्होंने अपनी शान के खिलाफ समझा।

सरकार से सीधा सवाल: वोट बैंक या सम्मान ?

यह घटना सिर्फ एक जनपद अध्यक्ष का अपमान नहीं है, यह मध्य प्रदेश के करोड़ों आदिवासियों का अपमान है। स्थानीय स्तर पर अब इस मामले को दबाने की घिनौनी साजिश रची जा रही है। आदिवासी समाज में इसे लेकर भयंकर रोष उबल रहा है।

अब गेंद सीधे भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री के पाले में है।

  • क्या ‘सबका साथ और सबका विश्वास’ के नारे में आदिवासियों के आत्मसम्मान के लिए कोई जगह है ?

  • क्या सरकार इस बेलगाम और अक्खड़ सीईओ पर तत्काल गाज गिराकर यह साबित करेगी कि उसके लिए आदिवासी केवल वोट बैंक नहीं हैं ?

अगर इस अहंकारी अधिकारी पर कठोरतम कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मान लिया जाएगा कि सत्ता के गलियारों में आदिवासी समाज के सम्मान की खुलेआम नीलामी हो रही है और सरकार खुद इस अपमान में मूक भागीदार है !