दतिया की हार से एमपी में भूचाल: क्या मध्य प्रदेश में होगा नेतृत्व परिवर्तन ?

मध्य प्रदेश की सियासी बिसात: दतिया उपचुनाव के झटके, दरकता जातिगत तिलिस्म और मुख्यमंत्री मोहन यादव के भविष्य पर उठते सवाल ..

दतिया उपचुनाव के नतीजों ने मध्य प्रदेश की शांत दिख रही सियासी झील में एक ऐसा पत्थर फेंका है, जिसकी लहरें सीधे दिल्ली के सत्ता-गलियारों तक महसूस की जा रही हैं। यह केवल एक सीट की हार नहीं है, बल्कि एक गहरे राजनीतिक असंतोष और दरकते सामाजिक समीकरणों का उद्घोष है। राजनीतिक हलकों में यह सुगबुगाहट तेज हो चली है कि भारतीय जनता पार्टी चार राज्यों (मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा आदि) में ‘नेतृत्व परिवर्तन’ के महामंथन में जुटी है, और इस संभावित राजनीतिक चक्रवात के केंद्र में मध्य प्रदेश और उसके वर्तमान मुख्यमंत्री, डॉ. मोहन यादव भी हैं।मध्य प्रदेश की वर्तमान राजनीति और मुख्यमंत्री मोहन यादव की स्थिति की एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ..

✍️ राकेश प्रजापति 

दतिया और विजयपुर के उपचुनावों की पराजय केवल जमीनी कार्यकर्ताओं या स्थानीय गुटबाजी की नाकामी नहीं है; इसे स्पष्ट रूप से शीर्ष नेतृत्व के ‘प्रबंधन कौशल’ की विफलता के तौर पर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के समक्ष एक बड़ा प्रशासनिक गतिरोध खड़ा हो गया है। पार्टी के भीतर यह असंतोष सुलग रहा है कि नौकरशाही और प्रशासन, जनप्रतिनिधियों (विधायकों) की अनसुनी कर रहा है।

मुख्यमंत्री का यह दावा कि “सबकी सुनी जा रही है” और धरातल पर विधायकों की वह बेबसी कि “प्रशासन फोन तक नहीं उठाता”, एक ऐसा गंभीर विरोधाभास पैदा कर रहा है जो अंततः जनता के बीच आक्रोश का रूप ले रहा है। यह प्रशासनिक शून्यता सरकार की साख पर भारी पड़ रही है।

वर्ष 2003 में दिग्विजय सिंह के अभेद्य किले को ढहाने के लिए भाजपा ने जो अचूक ‘ओबीसी-ब्राह्मण गठजोड़’ का ब्रह्मास्त्र तैयार किया था, वह अब ग्वालियर-चंबल अंचल में दरकता हुआ नजर आ रहा है। दतिया उपचुनाव इस बात का ज्वलंत प्रमाण है।

सवर्णों (ब्राह्मण/क्षत्रिय) और ओबीसी वर्ग के बीच गहराती खाई और सरकार द्वारा इस सामाजिक द्वंद्व को सुलझाने में दिखाई गई रणनीतिक उदासीनता ने समीकरण बिगाड़ दिए हैं। आरक्षण और यूजीसी के मुद्दों ने इस दरार को और चौड़ा कर दिया है। एक विशेष वर्ग के समर्थन में खड़े दिखने के नैरेटिव ने 15% ब्राह्मण और 15% एसटी मतदाताओं को नाराज कर दिया, जिसका सीधा खामियाजा भाजपा को अपनी परंपरागत सीट गंवाकर भुगतना पड़ा।

भाजपा के लिए सबसे निकटतम और विकट चुनौती आगामी स्थानीय निकाय चुनाव हैं। वर्तमान में महापौरों, पार्षदों और स्थानीय नेताओं के खिलाफ जनता में जो रोष पनप रहा है, वह किसी ज्वालामुखी से कम नहीं है। यदि इस असंतोष की ज्वाला को शांत करने के लिए समय रहते कोई ठोस ‘कोर्स करेक्शन’ (सुधारात्मक कदम) नहीं उठाया गया, तो परिणाम पार्टी के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं। यही वह निर्णायक बिंदु है, जो शीर्ष नेतृत्व को यह सोचने पर विवश कर रहा है कि क्या वर्तमान नेतृत्व इन चुनौतियों के पार ले जाने में सक्षम है, या राज्य को एक नए मुखिया की आवश्यकता है ? क्या इसके चलते ही प्रदेश में मुख्यमंत्री जन विश्वास यात्रा की छिंदवाडा से शुरुबात की गई है ..

मध्य प्रदेश किसी नए ‘राजनीतिक प्रयोग’ की दहलीज पर है ?

उमा भारती से लेकर बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान और अब मोहन यादव—भाजपा ने पिछले दो दशकों में ओबीसी चेहरों पर दांव खेलकर मध्य प्रदेश की सत्ता के शिखर को छुआ है। परंतु, अब यह समीकरण अपनी पूर्णता पर पहुंचता दिख रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027-28 के आगामी विधानसभा चुनावों से पहले, सवर्ण-ओबीसी के बीच आई इस सामाजिक दरार को पाटने के लिए भाजपा एक बार फिर 2003 जैसा कोई ‘क्रांतिकारी प्रयोग’ कर सकती है। यह प्रयोग किसी सर्व-स्वीकार्य नए चेहरे, नए जातिगत गठजोड़ और एक बिल्कुल नई राजनीतिक रणनीति के रूप में सामने आ सकता है।

जानकारों के मुताबिक दतिया की हार ने मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर एक गहन आत्म-मंथन का दौर शुरू कर दिया है। नरोत्तम मिश्रा, वी.डी. शर्मा और कैलाश विजयवर्गीय जैसे दिग्गजों की दिल्ली दौड़ मात्र शिष्टाचार भेंट नहीं है; यह एक नई पटकथा की आहट है। डॉ. मोहन यादव के लिए आने वाला समय कांटों भरा ताज साबित हो सकता है। यदि प्रशासनिक पकड़ और सामाजिक सामंजस्य जल्द स्थापित नहीं हुआ, तो दिल्ली का आलाकमान नेतृत्व परिवर्तन की उस सूची में मध्य प्रदेश का नाम भी प्रमुखता से शामिल कर सकता है, जिसकी पटकथा वर्तमान में गुपचुप तरीके से लिखी जा रही है।

सियासत में कोई भी फैसला रातों-रात नहीं होता, हर बड़े राजनीतिक तूफान से पहले ऐसी ही खामोश सुगबुगाहटें जन्म लेती हैं।