पर्यावरणीय अपराध पर वन विभाग का कड़ा प्रहार: सागौन तस्कर गिरफ्तार, वन मैनुअल से हो कार्रवाई तो सालों जेल में सड़ेंगे अपराधी
पर्यावरण और प्रकृति की अमूल्य धरोहर ‘सागौन’ के जंगलों पर तस्करों की बुरी नजर लगातार बनी हुई है। जंगलों की इस अंधाधुंध कटाई को केवल एक चोरी नहीं, बल्कि हमारी भावी पीढ़ियों के खिलाफ किया जा रहा एक गंभीर ‘पर्यावरणीय अपराध’ माना जाना चाहिए। पुलिस और वन विभाग की चौकसी से बचने के लिए इन वन माफियाओं ने अब तस्करी के तरीके बदल लिए हैं। चौपहिया वाहनों की जगह अब रात के अंधेरे में दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल कर जंगलों को खोखला करने की साजिश रची जा रही है। लेकिन, छिंदवाड़ा वन विभाग की सतर्कता ने इन पर्यावरण के दुश्मनों के मंसूबों पर करारा प्रहार किया है।
इस पूरे अभियान में छिंदवाड़ा वन विभाग की भूमिका अत्यंत सराहनीय और प्रेरणादायक रही है। वनमंडल अधिकारी के कड़े निर्देशों और छिंदवाड़ा रेंजर नीरज बिसेन के नेतृत्व में चल रही गश्ती टीम ने यह साबित कर दिया है कि यदि विभाग ठान ले, तो कोई भी अपराधी बच नहीं सकता।
रात के घनघोर अंधेरे में मुखबिर की सटीक सूचना पर त्वरित कार्रवाई करते हुए टीम ने दोपहिया वाहन से ले जाई जा रही 0.071 घन मीटर सागौन की दो सिल्लियां जब्त कीं। टीम की इस मुस्तैदी के कारण ही नजरु (पिता झलकू कमरे) और जितेन्द्र नामक दो तस्कर रंगे हाथों पकड़े गए। इस उत्कृष्ट कार्य में परिक्षेत्र सहायक लक्ष्मीकांत साहू, वनरक्षक सचिन ठाकुर, दामोदर उइके, आशीष चौहान, सुखदास साहू और अनीता मसराम का अमूल्य योगदान रहा। विभाग की यह सक्रियता दिखाती है कि वे हमारे इकोसिस्टम के सच्चे रक्षक हैं।
पेड़ों की कटाई सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन, वन्यजीवों के आवास विनाश और प्राकृतिक असंतुलन से जुड़ी है। ऐसे अपराधियों को किसी भी हाल में सामान्य चोरों की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
कड़ी धाराओं का उपयोग: यदि इन तस्करों पर ‘वन मैनुअल’ (Forest Manual) और ‘भारतीय वन अधिनियम’ के कड़े प्रावधानों के तहत मामला दर्ज कर पूरी सख्ती से कानूनी कार्रवाई की जाए, तो ऐसे पर्यावरणीय अपराधी सालों तक जेलों में सड़ेंगे।
अक्सर लचर कानूनी पैरवी या मामूली धाराओं के कारण ऐसे अपराधी जल्दी जमानत पाकर फिर से वनों का विनाश करने लगते हैं। वन अपराधों में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई जानी चाहिए।
न केवल लकड़ी और वाहन जब्त किए जाएं, बल्कि वन मैनुअल के प्रावधानों का उपयोग कर ऐसे अपराधियों की संपत्तियों की भी जांच होनी चाहिए ताकि संगठित पर्यावरणीय अपराध की कमर तोड़ी जा सके।
वन विभाग की इस सफल कार्रवाई ने आम जनता के मन में यह विश्वास जगाया है कि हमारे जंगल सुरक्षित हाथों में हैं। अब जिम्मेदारी न्याय-प्रणाली की है कि ऐसे मामलों में वन विभाग द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और वन अधिनियमों के आधार पर अपराधियों को ऐसी कठोर सजा मिले जो भविष्य के तस्करों के लिए एक नजीर बन सके। पर्यावरण बचाना हम सब की जिम्मेदारी है, और प्रकृति से खिलवाड़ करने वालों की असली जगह केवल सलाखों के पीछे है।