एक ‘रील’ की कीमत जिंदगी… और बंद खदानों का काल बनता पानी; छिंदवाड़ा में चार मासूमों की जलसमाधि
विशेष रिपोर्ट: लापरवाही और रोमांच की जुगलबंदी ने उजाड़े हंसते-खेलते चार परिवार
जब तक मोबाइल के फ्रंट कैमरे का शटर ऑन रहता है, तब तक जिंदगी एक खूबसूरत फ्रेम नजर आती है। लेकिन छिंदवाड़ा जिले से बुधवार को आई दो तस्वीरें दिल दहला देने वाली हैं, जहां इसी वर्चुअल ‘रोमांच’ और लापरवाही ने चार हंसते-खेलते नाबालिग बच्चों को मौत के गहरे आगोश में धकेल दिया। जिले के दो अलग-अलग पिकनिक स्पॉट्स—चौरई का प्रसिद्ध घोघरा वॉटरफॉल और जुन्नारदेव का कोठीदेव—बुधवार को चीखों और मातम के गवाह बन गए।
पेंच नदी की उफनती गहराई और डब्ल्यूसीएल (WCL) की बंद पड़ी खदान के पानी में डूबे इन चार बच्चों की तलाश में होमगार्ड और स्थानीय पुलिस की टीमें लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही हैं, लेकिन खबर लिखे जाने तक सिर्फ सन्नाटा और मायूसी ही हाथ लगी है।
हादसा नंबर 1: घोघरा वॉटरफॉल – बहन की आंखों के सामने मिट गया भाई का वजूद
चौरई के पास बेलखेड़ा स्थित घोघरा जलप्रपात अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है, लेकिन यहाँ पेंच नदी जहां टर्न (मोड़) लेती है, वहां करीब 35 से 40 फीट गहरा एक जानलेवा गड्ढा है। इसी जगह पर एक रील (Short Video) बनाने की सनक काल बन गई।
एक स्कूटी, पांच दोस्त और वो आखिरी सफर
छिंदवाड़ा के सिवनी प्राणमोती और पातालेश्वर इलाके से पांच बच्चे—14 वर्षीय गौरव डेहरिया, उसकी 12 वर्षीय बहन कृति, विनायक गुप्ता (17 वर्ष), दीपिका उईके और कल्पना धुर्वे—एक ही स्कूटी पर सवार होकर पिकनिक मनाने निकले थे। उन्हें क्या मालूम था कि यह सफर उनके जीवन का आखिरी सफर साबित होने वाला है।
फ्रेम सेट था, लेकिन पैर फिसल गया
प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिस के अनुसार, जलाशय के किनारे मोबाइल पर रील बनाने के दौरान अचानक पैर फिसलने से गौरव और उसका दोस्त विनायक गुप्ता गहरे पानी की तरफ चले गए। किनारे पर खड़ी 12 साल की छोटी बहन कृति चिल्लाती रही, हाथ पैर मारती रही, लेकिन उसकी आंखों के सामने उसका भाई गौरव और विनायक पेंच नदी के उस 40 फीट गहरे भंवर में विलीन हो गए। साथी बच्ची कल्पना धुर्वे ने तुरंत हिम्मत जुटाकर पुलिस को सूचना दी।
अतीत का खौफनाक सच: यह वही घोघरा वॉटरफॉल है जहां कुछ साल पहले एक युवक और उसका कुत्ता बाढ़ के बीच फंस गए थे, जिन्हें देश की सेना ने हेलीकॉप्टर की मदद से एयरलिफ्ट कर सुरक्षित बचाया था। इसके बावजूद प्रशासन और सैलानियों ने इस खतरे से कोई सबक नहीं लिया।
हादसा नंबर 2: जुन्नारदेव – मौत का स्विमिंग पूल साबित हुई खुली खदान
अभी चौरई की चीखें थमी भी नहीं थीं कि दोपहर में जुन्नारदेव के डूंगरिया चौकी क्षेत्र अंतर्गत कोठीदेव से एक और दिल दहला देने वाली खबर आ गई। यहाँ वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) की बंद पड़ी ओपन कास्ट (खुली) खदान में भरे पानी ने दो दोस्तों को लील लिया।
दोस्तों के साथ मौज-मस्ती बनी मातम
ग्राम तराक से करीब 10 बच्चों की टोली दोपहर में कोठीदेव पिकनिक स्पॉट के पास खेल रही थी। चिलचिलाती धूप से राहत पाने के लिए बच्चे खदान के जमा पानी में नहाने उतर गए। वे इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि कोयला निकालने के बाद छोड़ी गई यह खदानें नीचे से कितनी दलदली और खतरनाक होती हैं।
मदद के लिए उठने वाले हाथ पानी में खो गए
नहाने के दौरान तराक निवासी 17 वर्षीय राजा (पिता मनोहर बनवासी) और 16 वर्षीय आयुष (पिता बल्लू जावरे) अचानक गहराई में चले गए और डूबने लगे। उनके साथियों ने चीख-पुकार मचाई, आसपास के लोगों को आवाज दी, लेकिन जब तक कोई कुछ समझ पाता, दोनों गहरे पानी की तलहटी में समा चुके थे।
रेस्क्यू ऑपरेशन: अंधेरा और गहराई बनी बड़ी चुनौती
हादसे की सूचना मिलते ही प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया। जुन्नारदेव में एसडीओपी सुनील बरकड़े, टीआई जे. मसराम, एसआई अंजना मरावी और एसआई मुकेश डोंगरे तुरंत रेस्क्यू टीम के साथ मौके पर पहुंचे। वहीं छिंदवाड़ा से होमगार्ड की विशेषज्ञ गोताखोर टीम को दोनों घटनास्थलों पर रवाना किया गया।
बुधवार देर रात तक टॉर्च और फ्लड लाइट्स की रोशनी में पेंच नदी के गहरे गड्ढे और खदान के पानी में बच्चों को तलाशा गया, लेकिन पानी की अत्यधिक गहराई और रात के घनघोर अंधेरे के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन को अस्थाई रूप से रोकना पड़ा। सुबह होते ही दोबारा सर्चिंग अभियान शुरू किया गया है।
बड़ा सवाल: आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन ?
यह कोई पहला वाकया नहीं है जब छिंदवाड़ा के पिकनिक स्पॉट्स पर मासूमों की जान गई हो। इस दोहरे हादसे ने एक बार फिर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
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प्रतिबंध के बाद भी लापरवाही क्यों ? क्या खतरनाक घोषित किए गए जलप्रपातों पर सुरक्षा गार्ड और चेतावनी बोर्ड केवल कागजों तक सीमित हैं ?
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WCL की खदानों की फेंसिंग क्यों नहीं ? कोयला कंपनियां खनन के बाद इन गहरी खदानों को खुला और असुरक्षित क्यों छोड़ देती हैं, जो बाद में ‘मौत का तालाब’ बन जाती हैं ?
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अभिभावकों की जिम्मेदारी: एक ही स्कूटी पर पांच-पांच नाबालिग बच्चे छिंदवाड़ा से चौरई (लगभग 30-35 किमी) दूर निकल जाते हैं और परिजनों को भनक तक नहीं लगती ?
संपादकीय टिप्पणी: सोशल मीडिया पर ‘लाइक’ और ‘व्यूज’ बटोरने की अंधी दौड़ आज की पीढ़ी की रगों में इस कदर दौड़ रही है कि उन्हें जिंदगी और मौत का फर्क नजर नहीं आ रहा। यह हादसा केवल एक समाचार नहीं, बल्कि हर उस माता-पिता और युवा के लिए एक चेतावनी है जो रोमांच के चक्कर में सुरक्षा को ताक पर रख देते हैं।