एमपी कांग्रेस में बड़ा उलटफेर: दिग्विजय की सीट से मीनाक्षी नटराजन को टिकट, कमलनाथ का पत्ता कटा..

एमपी कांग्रेस का ‘पावर शिफ्ट’: दिग्विजय की सीट, कमलनाथ का ‘नो-शो’ और मीनाक्षी नटराजन का उदय

मध्य प्रदेश की राज्यसभा राजनीति में इस बार जो हुआ है, उसे सिर्फ एक ‘नामांकन’ समझना राजनीतिक भूल होगी। यह असल में एमपी कांग्रेस के भीतर चल रहे एक मूक लेकिन बड़े ‘ऑपरेशन क्लीन एंड रीबूट’ की पहली आधिकारिक स्क्रिप्ट है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की खाली हो रही सीट पर राहुल गांधी की बेहद भरोसेमंद और वैचारिक रूप से मजबूत मीनाक्षी नटराजन को उतारकर आलाकमान ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं।

यह फैसला केवल एक नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने का नहीं, बल्कि सूबे के दो सबसे बड़े दिग्गजों—दिग्विजय सिंह और कमलनाथ—के युग के बाद की कांग्रेस की रूपरेखा तय करने का है।

✍️ राकेश प्रजापति 

दिग्विजय सिंह की ‘सम्मानजनक’ विदाई और वैकल्पिक नेतृत्व

दिग्विजय सिंह पिछले तीन दशकों से मध्य प्रदेश कांग्रेस के ‘चाणक्य’ रहे हैं। उनके कोटे की सीट पर मीनाक्षी नटराजन को लाना यह साफ संकेत है कि पार्टी अब उनके प्रति आदर तो रखती है, लेकिन भविष्य की राजनीति के लिए उनके विकल्प तैयार कर चुकी है।

इसे दिग्विजय सिंह की सक्रिय राजनीति का अंत भले न कहा जाए, लेकिन यह उनके युग के ‘प्रतीकात्मक अवसान’ की शुरुआत जरूर है। पार्टी अब विवादों से दूर, कैडर-आधारित और सीधे दिल्ली से जुड़े चेहरों को राष्ट्रीय मंच देना चाहती है।

कमलनाथ को मौका न मिलने के पीछे का ‘पॉलिटिकल नैरेटिव’

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे गहरा सस्पेंस और विमर्श कमलनाथ को लेकर है। विधानसभा चुनाव के बाद से ही हाशिए पर चल रहे कमलनाथ के लिए यह राज्यसभा सीट एक राजनीतिक जीवनदान हो सकती थी, लेकिन उन्हें मौका न दिए जाने के पीछे तीन बेहद महत्वपूर्ण आयाम हैं:

आलाकमान अब पूरी तरह से ‘कमलनाथ युग’ से आगे बढ़ चुका है। 2023 की हार के बाद पार्टी यह मान चुकी है कि अब प्रदेश में ‘बुजुर्ग और कारपोरेट’ शैली की राजनीति की एक्सपायरी डेट आ चुकी है। कमलनाथ को बाईपास करना यह संदेश है कि अब दिल्ली की मर्जी ही सर्वोपरि है।

 राजनैतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी सीमाओं के कारण पार्टी अब कमलनाथ पर भविष्य का दांव लगाने से हिचक रही थी। राज्यसभा जैसी सक्रिय और वैचारिक बहस वाली जगह के लिए पार्टी को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो शारीरिक और मानसिक रूप से 24×7 उपलब्ध रहे।

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के ‘केंद्रीकृत’ नेतृत्व के कारण एमपी कांग्रेस में ‘सेकंड लाइन लीडरशिप’ (दूसरी पीढ़ी के नेता) कभी पनप ही नहीं पाई। कमलनाथ को रेस से बाहर रखकर पार्टी ने साफ कर दिया कि अब गुटबाजी और ‘नेताओं के कोटे’ से टिकट मिलने का दौर खत्म हो चुका है।

महिला कार्ड और राहुल गांधी की ‘कोर टीम’ की वापसी

एक ऐसे समय में जब भाजपा ने मध्य प्रदेश से तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल जैसे जमीनी और संगठनात्मक चेहरों को राज्यसभा भेजकर अपनी पकड़ मजबूत की है, कांग्रेस का जवाब भी उतना ही सटीक है।

मीनाक्षी नटराजन का चयन दो स्तरों पर भाजपा को टक्कर देता है:

भाजपा की ‘लाड़ली बहना’ काट के सामने कांग्रेस ने एक बेहद पढ़ी-लिखी, प्रखर और बेदाग महिला चेहरे को राष्ट्रीय स्तर पर पेश किया है।

राहुल गांधी की कोर टीम का हिस्सा रहीं नटराजन केवल चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि वैचारिक राजनीति के लिए जानी जाती हैं।

क्या सिर्फ चेहरा बदलने से बदलेगी जमीन ?

कांग्रेस ने मीनाक्षी नटराजन के जरिए अपनी नीयत और नीति तो साफ कर दी है, लेकिन असल चुनौती अब शुरू होती है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस इस समय लगातार चुनावी हार, सांगठनिक बिखराव और कार्यकर्ताओं के टूटते मनोबल से जूझ रही है।

ऐसे में माना जा रहा कमलनाथ को आराम देने और दिग्विजय की जगह मीनाक्षी को लाने का यह साहसिक कदम तब तक बेअसर रहेगा, जब तक इसे जमीन पर ब्लॉक और जिला स्तर के पुनर्गठन से नहीं जोड़ा जाता। अगर यह सिर्फ दिल्ली के एक वीआईपी को राज्यसभा भेजने तक सीमित रहा, तो नतीजा सिफर ही रहेगा। लेकिन अगर यह एमपी कांग्रेस के नए युग की शुरुआत है, तो भाजपा के लिए आने वाले दिनों में चुनौती कड़ी होने वाली है।