मुकाफ़ात का निज़ाम : जब अपनों के ही आरोपों से घिरा सत्ता का गलियारा ..

मुकाफ़ात-ए-अमल: जब राजनीति का ‘बूमरैंग’ लौटकर वार करता है

कहावत पुरानी है—“जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।” लेकिन राजनीति के अखाड़े में जब अनैतिकता और चरित्र-हनन के बीज बोए जाते हैं, तो फसल भी वैसी ही कड़वी काटनी पड़ती है। उर्दू का शब्द ‘मुकाफ़ात’ महज़ एक शब्द नहीं, बल्कि प्रकृति का वह न्याय-तंत्र है जो पाई-पाई का हिसाब चुकता करता है। आज भारतीय राजनीति के मंच पर जो कुछ घट रहा है, वह इसी ‘मुकाफ़ात के निज़ाम’ का जीवंत उदाहरण है।

✍️ राजनीतिक विश्लेषण : राकेश प्रजापति 

चरित्र-हनन का कुचक्र और नियति का प्रहार :

दशकों से एक विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा ने महापुरुषों और विरोधियों के शयनकक्षों में ताक-झांक करने को अपनी मुख्य नीति बना लिया था।

  • महात्मा गांधी की साधना पर कीचड़ उछालना,

  • पंडित नेहरू के व्यक्तिगत संबंधों को विकृत कर पेश करना,

  • इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी जैसी महिला नेताओं के विरुद्ध अभद्र और मनगढ़ंत विमर्श रचना,

  • और राहुल गांधी के विरुद्ध आधारहीन ‘स्टिंग’ और आरोपों की फैक्ट्री चलाना।

यह सब एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य वैचारिक लड़ाई के बजाय व्यक्तिगत मर्यादा को ध्वस्त करना था। लेकिन नियति का पहिया घूमा और आज वही ‘अस्त्र’ उन पर वापस लौट रहे हैं जिन्होंने इसे धार दी थी।

अपनों के वार और ‘सन्नाटे’ की राजनीति : कल तक जो खेमा दूसरों के चरित्र पर प्रमाण पत्र बांटता था, आज वह खुद आत्मरक्षा की मुद्रा में है। विडंबना देखिए:

  1. भीतर से उठती आवाजें: सुब्रमण्यम स्वामी जैसे वरिष्ठ नेता जब प्रधानमंत्री के व्यक्तिगत चरित्र और दल की महिला नेताओं पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं, तो पूरी ‘ट्रोल्स की फौज’ मौन धारण कर लेती है।

  2. मधु किश्वर का यू-टर्न: जो कभी सरकार की सबसे प्रबल पैरोकार थीं, आज वही स्मृति ईरानी और अन्य नेताओं के विरुद्ध ‘सीडी’ और ‘सबूत’ सार्वजनिक करने की चुनौती दे रही हैं।

  3. स्टिंग और हलफनामे: भाजपा की ही एक नेत्री द्वारा बड़े नेताओं पर लगाए गए गंभीर आरोप और आईएएस प्रदीप शर्मा से लेकर आनंदीबेन पटेल के पति के पुराने पत्रों का फिर से वायरल होना—यह कोई संयोग नहीं, बल्कि उसी विषैले विमर्श का फल है जिसे वर्षों तक पाला-पोसा गया।

दोहरे मापदंडों का बेनकाब होना :

जब राहुल गांधी की ज़बान फिसलती है, तो प्रवक्ताओं की एक पूरी जमात आसमान सिर पर उठा लेती है। लेकिन जब उनके अपने ही कुनबे के लोग (स्वामी, किश्वर या यति नरसिंहानंद) मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हैं, तो वह ‘अनुशासन’ और ‘संस्कार’ कहाँ लुप्त हो जाते हैं?

सच तो यह है: बिना तथ्य और बिना सबूत के आरोप लगाना जितना नेहरू-गांधी परिवार के लिए गलत था, उतना ही वह आज सत्ता पक्ष के नेताओं के लिए भी गलत है। लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि आज उन्हें उसी कड़वी दवा का स्वाद चखना पड़ रहा है जो वे दूसरों को पिलाते रहे हैं।

इतिहास का हिसाब बाकी है : 

निशिकांत दुबे, संबित पात्रा और अनुराग ठाकुर जैसे नेताओं ने जिस ‘बिना सबूत वाले विमर्श’ की नींव रखी थी, आज उसी नींव पर उनके अपने महल ढहते नज़र आ रहे हैं। राजनीति की बिसात पर जब आप ‘कीचड़’ को हथियार बनाते हैं, तो याद रखिए कि हवा का रुख बदलते ही आपके अपने हाथ और चेहरे भी उसी कीचड़ से सनेंगे।

इसे ही “मुकाफ़ात का निज़ाम” कहते हैं—जहाँ कर्म अपने कर्ता को ढूंढ ही लेते हैं। आज जो शोर है, वह कल की बोई हुई नफरत और झूठ की गूँज मात्र है। सत्ता रहे न रहे, पर इतिहास के पन्नों में यह दर्ज हो रहा है कि जिसने जैसा बोया, उसने वैसा ही पाया।

इतिहास की अदालत और कर्मों का तराजू  :

“अंततः, राजनीति की बिसात पर शह और मात का खेल चलता रहेगा, हुकूमतें आएंगी और जाएंगी, लेकिन ‘मुकाफ़ात का निज़ाम’ शाश्वत है। प्रकृति का न्याय किसी दल या विचारधारा का मोहताज नहीं होता; वह निष्पक्ष होकर कर्मों का हिसाब चुकता करता है।

आज जो राजनीतिक कोहराम और अपनों के ही वार सुनाई दे रहे हैं, वे महज़ इत्तेफाक नहीं हैं। यह उस नफरत, झूठ और चरित्र-हनन के बीजों की कड़वी फसल है, जिसे बीते वर्षों में सींचा गया था। यह एक निर्विवाद सत्य है कि ‘बूमरैंग’ जब लौटता है, तो वार दोगुना गहरा होता है।

सत्ता के गलियारों में गूँजता आज का यह शोर, दरअसल कल की बोई हुई नफरत की प्रतिध्वनि मात्र है। इतिहास के पन्नों में यह सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो रहा है कि जिसने जैसा बोया, उसने वैसा ही पाया। वक्त किसी का उधार बाकी नहीं रखता, और आज राजनीति अपना ही हिसाब बराबर कर रही है।”

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