मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलियाजी द्वारा रचित ‘गीता ज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया
है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है। उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक की 49 वी कड़ी ..
चतुर्थोऽध्यायः – ज्ञान योग
दिव्य ज्ञान का योग, ज्ञान-कर्म-सन्यास योग “याने ज्ञान और कर्म के सच्चे -त्याग का योग
श्लोक (२१)
अपने वश में किए चित को और आत्मा को अपनी,
त्याग सम्पदाओं का करके और त्याग वृत्तियाँ सब अपनी ।
केवल कर्म करे शरीर से, उसे न दोष लगता कोई,
प्रतिबिम्बित करता वह मानो परमेश्वर की इच्छा ही ।
बन जाती मानवीय आत्मा माध्यम अखिल चेतना का
कर्म करे पर कर्म पाश में नहीं मनुज ऐसा बँधता.
श्लोक (२२)
दैवयोग से प्राप्त वस्तु स, जा मानव सन्तुष्ट रहे.
द्वन्द न जिसको करे प्रभावित, सुख-दुख से जो परे रहे ।
ईर्ष्या से जो मुक्त रहे, सम सिद्धि असिद्धि रहे जिसको,
वह कर्म करे पर कर्म नहीं बन्धनकारी बनते उसको ।
श्लोक (२३)
जिसमें न शेष आसक्ति रही, हो चुका मुक्त जो मनुज पार्थ.
मन सुस्थिर हुआ ज्ञान में ही, हो कर्म-यज्ञ जिसको यथार्थ ।
हो गया विलीन कर्म उसका, उसके सब कर्म अकर्म रहे,
जैसे होता बादल विलीन नभ में, असमय का बिन बरसे ।
त्याग करे आशा का अपने, अहंकार को भी छोड़े,
पाए ब्रह्मानन्द उसी में, लीन रहे ममता छोड़े ।
प्राप्त सहज जो कुछ हो जाये, उससे ही सन्तोष करे,
अपने और पराये का, जिसमें न भेद लवलेश रहे ।
जाती दृष्टि जहाँ तक उसकी, अपने को ही पाता है,
जो सुनता है स्वर, अपना उसको सुनने में आता है ।
करता जो व्यवहार सभी में, पाता है वह अपने को
कौन कर्म फिर उसका होता, उसको बन्धन बनने को ?
करता सारे कर्म मगर वह कर्म रहित रहता अर्जुन,
गुणातीत रहता है, यद्यपि रहता है वह पुरुष सगुण ।
दीखे वह चैतन्य, विचारों में यों रहा देहधारी,
करता रहता कर्म, मगर रहता विमुक्त योगाचारी
अर्पण करने का कार्य उसे, परमात्मा का ही रूप रहा,
वह वस्तू किया जिसका अर्पण, वह परमात्मा का रूप रहा ।
परमात्मा ने परमात्मा को ही दिया अग्नि में होम पार्थ,
वह प्रभु में लीन ब्रह्मज्ञानी, परमात्मा उसको हुआ प्राप्त ।
वह यज्ञ, खुवा, हवि, यज्ञ-क्रियाएँ, जिसमें ब्रह्म रूप होतीं,
कर्ता जिसका हो ब्रह्म, ब्रह्म ही यज्ञ-अग्नि जिसकी होती ।
हो कर्म ब्रह्म, हर वस्तु, क्रिया जिसकी बस ब्रह्म समान रहे,
वह योगी ब्रह्म कर्म का फल जो पाये वह भी ब्रह्म रहे ।
यह हवन रहा, इसका कर्ता मैं ऐसा जिसका भाव नही,
जिसको हो आया आत्मरूप, हर होम द्रव्य, विधि मन्त्र सभी ।
पार्थिव जीवन में शाश्वतता, रहती है उसके विद्यमान,
वह योगी ब्राह्म-यज्ञ करता, यह जगत रहा जिसको समान ।
श्लोक (२५)
कुछ योगी रहे दूसरे जो करते हैं देव यज्ञ अर्जुन,
मुझको पाने की इच्छा से, करते हैं देवों का पूजन ।
विधिवत संपादित किया उन्हें फलदायक होता अनुष्ठान,
जो देव भजा जाता उससे पा जाते हैं वे आत्मज्ञान ।
योगीजन उनसे भिन्न रहे, जो ब्रह्मयज्ञ को रचते हैं
जो अग्निब्रह्म की रही, यज्ञ में यज्ञ समर्पित करते हैं
वे रहे अग्निहोत्री कि यज्ञ में आत्मरूप का हवन करें
दर्शन अभेद का हो, उनको ब्रह्माग्नि बने वे स्वयं जलें
श्लोक (२६)
अन्यान्य यज्ञ भी होते हैं, योगी जन जिन्हें रचाते हैं,
होती हवि उनकी अलग-अलग, जिसका ने हवन चंढ़ाते हैं।
पंचेन्द्रिय की आहूति देते, संयम की अग्नि शिखा में वे,
या विषयों की आहुति डालें, इन्द्रिय की अग्नि शिखा में वे।
यह अग्निहोत्र इसमें योगी, संयम की अग्नि तीव्र करता,
श्रोतादि समस्त इन्द्रियों की, हवि का जिसमें अर्पण करता ।
शब्दादि समस्त विषय उनकी, हवि का भी योगी करे हवन,
यज्ञाग्नि इन्द्रियों की प्रदीप्त होकर, जिस हवि को करे ग्रहण । क्रमशः…