रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।एकादशोऽध्यायः ‘विश्व रूप दर्शन योग’
अध्याय ग्यारह – ‘भगवान का दिव्य रूपान्तर’
श्लोक (३६)
अर्जुन उवाच :-
जो कहा आप हैं काल रुप, ग्रस लिए आपने महारथी,
करता विचार तो सत्य बात यह, मुझको सही नहीं जँचती ।
इसलिए कि यह मध्यान्ह अभी, क्या सूर्य मध्य में डूबेगा?
क्या प्रलय काल के पहिले ही, जीवन विनष्ट यह हो लेगा?
यौवन निकालकर पहिले ही, बृद्धत्व भरा जा सकता क्या?
जो तीन दशाएँ ध्रुव भगवन, क्या उन्हें मिटाया जा सकता?
क्या निर्धन कहला सकता है, जो अक्षय पुण्यों का स्वामी?
क्या प्राकृतिक क्रम बदला तो, होगी न न्याय की बदनामी?
संकेत भाव से केशव ने, बतलाया सेना का जीवन,
हो चुका पूर्ण इतना ही बस, दिखलाया है तुमको अर्जुन ।
ये लोग मरेंगे यथा समय, वह अवसर भी अब दूर नहीं,
अर्जुन ने देखा सेना को, वह दिखी पूर्ववत वहीं खड़ी।
हे सूत्रधार जग-जीवन के, यह दशा पूर्ववत दीख रही,
सुख की लहरों में तैर रहा, प्रभु अमिट आपकी लीक रही ।
यह विश्व प्रेम में मग्न हुआ, कर रहा कीर्ति का गान प्रभो,
लेकिन दुष्टों का दल विदग्ध, भागा फिरता अति दूर प्रभो ।
हे हृषीकेश सम्पूर्ण विश्व, सुन रहा आपका संकीर्त्तन,
हर्षित अनुरक्त सिद्ध प्राणी, कर रहे आपको विनत नमन ।
राक्षसगण पर भयभीत हुए, दिशि दिशि में भाग रहे भगवन,
यह उचित आपके योग्य सदा, प्रभु तुमको बारम्बार नमन ।
श्लोक (३७)
आलोक धाम हे महापुंज पा रहा आपसे जग प्रकाश,
हो सूर्योदय तो कहाँ रहे, रवि-निकर देखकर अन्धकार?
रह सकते राक्षस वहाँ कहाँ, श्रीपते आपका वास जहाँ,
हो रहा देवताओं द्वारा, देवाधिदेव का गान जहाँ ।
हे परमात्मन, हे आदि देव, ब्रह्म से प्रथम कि आदिकर्ता,
क्यों आपको न नमन करें ये सब, देवों के प्रभु, जग के भर्त्ता
आप है अनन्त,हे जग-निवास, आप रहे कारणों के कारण,
आप अक्षर परम,परे जग से, महिमा परमोच्च किए धारण ।
सब करते आपको नमस्कार, आप सर्वोत्तम सर्वोच्च रहे,
आधार सभी के प्राणों के, सबके भीतर जयमन्य रहे ।
आपने ही रचा विधाता को, आपसे न बड़ा कोई भगवन,
आप जैसे केवल आप ही हो, पुनि-पुनि चरणों में देव नमन ।
क्यों करें न आपको सब प्रणाम, आप हो सबसे बढ़कर महान,
आप रहे प्रजापति से बढ़कर, आपमें जीवन पाता विराम ।
सुर, नर, मुनि यक्षों का स्वामी, आप ही नश्वर, अविनश्वर आप,
आप सृष्टा का पहिला सृष्टा, आप अपरा, परा परे हो आप ।
श्लोक (३८)
हे प्रभो आप हैं परम देव, हैं पुरुष सनातन पूर्णकाम,
हैं एकमेव जग के आश्रय, विद्या वारिधि, हे बलनिधान ।
सब कुछ के ज्ञाता आप रहे, हैं आप जानने योग्य परम,
सर्वत्र आप ही, हे अनन्त, हे गुणातीत हे धाम परम ।
हे ज्ञाता ज्ञेय अनन्त रुप, सर्वोच्च लक्ष्य, घट-घट वासी,
हे आद्य पुरुष, हे जग निवास, हे परम तत्व हे अविनाशी ।
हे जग जीवन के विस्तारक, हे भेद रहित प्रभु चिदानन्द,
सारे जीवों के अधिष्ठान, हे जगत व्याप्त आनंद कन्द ।
श्लोक (३९)
हैं आप देव परिव्याप्त वायु, हैं आप स्वयं यमराज प्रभो,
हैं अग्नि देव, पावक भगवन, हैं वरुण देवता आप प्रभो ।
शशि आप प्रजापति ब्रम्हा है, ब्रम्हा के भी हैं पितृ देव,
सौ-सौ हजार प्रभु नमस्कार पुनि नमस्कार हे परम देव ।
जग में क्या ऐसी वस्तु रही, जिसमें न समाए आप रहे,
या जगह रही कोई ऐसी, जिसमें न आपका वास रहे ।
जितनी विभूतियाँ जगन्नाथ, सब रहीं आपका उपादान,
सौ-सौ प्रणाम तुमको भगवन, पुनि-पुनि करता आपको प्रणाम । क्रमशः…