भारतीय संस्कृति और प्रकृति, दीपावली पर दीपक का अर्थ, गणेश-कुबेर पूजा, धन और धर्म ….
भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का विकास नदियों के तटों पर हुआ है, इसलिए भारतीय संस्कृति को यदि प्राकृतिक संस्कृति कहो जाए तो अतिशयोक्ति न होगी. यही कारण है कि अनादिकाल से एकमात्र प्रकृति की ही पूजा होती रही है. सूर्य, चंद्र, नदी, वनस्पतियाँ सभी प्राकृतिक सभ्यता मानी जाती है..
✍️ राकेश प्रजापति
सभ्यता के प्रथम चरण में मनुष्य के लिए पृथ्वी ही सब कुछ थी. पशु धन और अज-धन यही सर्वश्वय थे. तब लक्ष्मी भू-देवी के रूप में समाद्धत थी. जैसे-जैसे संस्कृति का विकास होता गया प्राकृतिक सम्पदाओं के रूप भी बदलते गए, प्रकृति ने हमारे देश को तीन प्रकार की ऋतुएं ग्रीष्म, वर्षा और सर्दी प्रदान की है. वर्षा ऋतु में कहीं आना-जाना संभव नहीं था, क्योंकि आवागमन के साधनों का विकास नहीं हुआ था. कीट-पतंगों का बाहुल्य हो जाने से मानव समाज अपने परिवार के साथ ही समय व्यतीत करता था, लोग स्वाध्याय करते थे, सत्संग में भाग लेते थे और यश करते थे. वर्षा ऋतु एक प्रकार से सत्कर्म करने की प्रेरणा देती थी.
वर्षा ऋतु की समाप्ति पर विजया दशमी का त्यौहार यह संदेश लेकर आता है कि वर्षा समाप्ति पर है, इसलिए कर्म के लिए तैयार हो जाओ. संभवतः यही कारण है कि प्राचीन काल में विजय दशमी का नाम सीमोल्लंघन था. अश्विन मास के समाप्त होते ही कार्तिक मास अनेक पर्वो और त्यौहारों की श्रृंखला लेकर जनमानस में अपूर्व उल्लास एवं उत्साह का संचार करता है ।
दीपक का अर्थ ….
पर्व हो या कोई उत्सव, दीपक का अपना विशेष स्थान है और दीपक भी माटी का ही हो, दीपक और बाती का संबंध भी अति धनिष्ठ है, दीपक में तेल का होना भी आवश्यक है, यदि तेल नहीं होगा ओर बाती जलेगी तो प्रकाश का होना सर्वथा असंभव है. लक्ष्मी पूजन के लिए गंगा जल युक्त घड़ा भी चाहिए और यज्ञ के लिए समिधा भी. यह सब इस के प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति से अपना तदाम्य स्थापित कर पुष्वित एवं पल्लवित हुई है. लक्ष्मी पूजन और लक्ष्मी जी के आह्वान से आज के चदलते आर्थिक विश्व परिप्रेक्ष्य में यह शिक्षा मिलती है कि आर्थिक स्थिति सुदृढ़ रखना ही व्यक्ति या राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव है !
लक्ष्मी जी का एक नाप दुर्गा भी है जो कि शक्ति की देवी है और इससे एक बड़ी महत्वपूर्ण व्यवहारिक शिक्षा यह मिलती है कि चाहे व्यक्तिगत पारिवारिक या सामाजिक जीवन की बात हो या विभिन्न देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की शक्ति की महता निर्विवाद है, शक्ति के बिना शांति भी संभव नहीं है. क्योंकि ‘भय बिनु बिनु होय न प्रीति’. यही नहीं शक्तिशाली व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों पर दादागिरी भी दिखाता है, तो भी कोई उसे बुरा नहीं कहता क्योंकि, समरथ को नहीं दोष गोसाई’ इस प्रकार लक्ष्मी जी का पूजन एकांगी नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि गणेश जी की पूजा से हमें मानसिक शांति ही नहीं मिलती है बल्कि उनके अद्भुत शरीर से अनेक शिक्षाएँ भी मिलती है जैसे मानव और हाथी का मिला हुआ शरीर के क्रमिक विकास को बताता है, पार्वती (पृथ्वी के विलाप से शिवजी द्वारा हाथी का सिर लगाकर) गणेश जी का पुर्नजीवन मानों हम सबको वृक्षारोपण करके पर्यावरण सुधार की शिक्षा देता है. उनके चारों हाथों में त्रिशूल त्रितापनाशी, अक्षमाला जीवन चक्र परिवर्तनशील है अर्थात मानव जीवन में सुख-दुःख होता तो आते ही रहते हैं. उनसे घबराना नहीं चाहिए, परशु-सज्जनों की रक्षा के लिए दुष्ट दमन एवं लड्डू प्रसन्न रहने की शिक्षा देतें हैं. एक हाथ में बंधा धागा मानो मर्यादाओं में बंधे रहने एवं परशु हम सबको बुराइयों को काट डालने की भी शिक्षा देते हैं!
ऋग्वेद में उल्लेखित गणपति का अर्थ है गणों के देवता जो नेतृत्व शक्ति का प्रतीक बनकर मानो जनतांत्रिक होने तथा जनतांत्रिक वातावरण निर्माण की शिक्षा देते हैं. साथ ही गणेश जी को बुद्धि का देवता माना गया है और उनके बड़े-बड़े कान हम सबको श्रवणीय सुनकर ग्रहण करने की शिक्षा देते हैं. कुबेर – गणेश का महत्व लक्ष्मीजी के साथ साथ कुबेर और गणेश जी का योगदान भी चाहिए, कुबेर देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं तो गणेश जी लेखाध्यक्ष आज की भाषा में कहा जाए तो एक खजांची है तो दूसरा एकाउंटेंट जनरल. दोनों ही वित्त विभाग के मुखिया है. यदि इन दोनों का तालमेल न हो तो लक्ष्मी को कोई भी हड़प सकता है. वैसे भी लक्ष्मी का एक नाम चंचला है. लक्ष्मी को एक स्थान पर रहना रुचिकर नहीं लगता. उनका आवागमन होता रहे तो परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व सभी का विकास होता रहेगा, अवरुद्धता की स्थिति किसी भी दृष्टि से हितकर नहीं।
लक्ष्मी के मित्र और शत्रु….
हमारे ऋषि मुनियों ने इस बात की ओर से भी स्पष्ट संकेत दिया है कि लक्ष्मी केवल दीप जलाने, नैवेद्य चढ़ाने पूजा करने या आरती उतारने से नहीं आती. वह याचना करने से भी प्रसन्न नहीं होती. याचक से वह कोसों दूर। भागती है. उद्यमी व्यक्ति ही लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करते हैं. शायद इसीलिए कहा गया है, ‘व्यापार वसति लक्ष्मी’ अथवा ‘उद्योगिनम पुरुष सिंह मुपैति लक्ष्मी अर्थात व्यापार उद्योग धंधो में ही लक्ष्मी का वास है. जिस व्यक्ति में व्यापार बुद्धि नहीं होती, वह चाहे कितना ही योग्य विद्वान क्यों न हो, लक्ष्मी उसके पास नहीं फटकती. अगर आती भी है तो शीघ्र ही उससे अपना पिंड छुड़ा लेती है. लक्ष्मी के एक मित्र और तीन शत्रु बताए गए हैं. धर्म लक्ष्मी का सहोदर भ्राता है. कहते हैं जहाँ धर्म का आदर नहीं होता वहाँ रहना लक्ष्मी को कदापि रुचिकर नहीं, धर्म का अर्थ यहाँ कर्तव्य भाव से है. यदि व्यक्ति लक्ष्मी को कैद करके रखना चाहते हैं तो लक्ष्मी के तीन शत्रु उसका साथ देते हैं या तो शासन की ओर से कर के रूप में राशि में हड़प ली जाती है. यदि ऐसा न हुआ तो चोरों का समुदाय लक्ष्मी को कैद से मुक्त करा देता है और यदि ऐसा भी न हुआ तो अग्नि लक्ष्मी को कैदी बनाने वाला घर ही साफ कर देती है. लक्ष्मी को स्वच्छता बहुत प्रिय है ।