सड़कों पर ‘मौत’ का खुला खेल: खूंखार कुत्तों ने नोंच डाला छिंदवाड़ा, और एसी कमरों में खर्राटे भर रहा नकारा प्रशासन !
छिंदवाड़ा की सड़कें अब आम आदमी के चलने के लिए नहीं, बल्कि जान बचाने के लिए भागने का खौफनाक अखाड़ा बन चुकी हैं। शहर में आवारा और खूंखार कुत्तों का आतंक इस कदर हावी है कि इंसान अपने ही मोहल्लों में खौफ का बंधक बन गया है। महज 31 दिनों में 290 लोगों को इन कुत्तों ने अपना शिकार बनाया है। मासूम बच्चे घरों में कैद रहने को मजबूर हैं, लेकिन कुर्सी पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी अपनी वातानुकूलित कक्षों में गहरी कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं। जनता टैक्स का पैसा भर रही है और प्रशासन उन्हें कुत्तों से नुंचवाने के लिए सड़कों पर लावारिस छोड़ चुका है। सवाल यह है कि क्या यह बेशर्म तंत्र तब जागेगा, जब किसी मासूम की जान चली जाएगी ?
राकेश प्रजापति
हर दिन 10 लोग हो रहे लहूलुहान
यह कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि एक घोषित महामारी बन चुकी है।
हर दिन औसतन 9 से 10 लोग इन वहशी कुत्तों के जबड़ों का शिकार होकर जिला अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं।
जनवरी से लेकर मई तक के आंकड़े इस नकारे सिस्टम के मुंह पर सीधा तमाचा हैं। अब तक कुल 1,428 लोग कुत्तों के जानलेवा हमले का शिकार हो चुके हैं:
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जनवरी: 308 शिकार
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फरवरी: 225 शिकार
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मार्च: 303 शिकार
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अप्रैल: 302 शिकार
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मई: 290 शिकार
अधिकारियों का निकम्मापन: कागजों पर नसबंदी, सड़कों पर ‘शिकार’
नगर निगम और स्थानीय प्रशासन के निकम्मेपन की इससे बड़ी और शर्मनाक मिसाल क्या होगी? कुत्तों की बढ़ती आबादी पर नियंत्रण के नाम पर सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाए जा रहे हैं। नसबंदी अभियान भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ चुके हैं। शहर के राज टॉकीज मटन मार्केट क्षेत्र, दीवानचीपुरा, नया बैल बाजार, लालबाग, नोनिया, परतला, मेडिकल कॉलेज परिसर, डीडीपुरम, ईशानगर, चौकसे कॉलोनी, बरारीपुरा क्षेत्र और राजपाल चौक जैसे इलाके अब ‘डेंजर जोन’ बन चुके हैं। रात के वक्त यहां से गुजरना साक्षात मौत को दावत देना है। कुत्तों के झुंड बाइक सवारों पर इस तरह टूटते हैं मानो वे किसी जंगल के भूखे भेड़िए हों। कई लोग दुर्घटनाग्रस्त होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं, लेकिन मजाल है कि किसी अधिकारी के माथे पर चिंता की एक लकीर भी खिंचे!
सॉफ्ट टारगेट बन रहे मासूम बच्चे और बुजुर्ग
इन खूंखार कुत्तों का सबसे आसान और पहला टारगेट बन रहे हैं हमारे मासूम बच्चे। बीते दिनों मोहगांव और पांढुर्ना में खेलते हुए बच्चों पर इन कुत्तों ने जो जानलेवा हमला किया, वह किसी भी पत्थर दिल इंसान को दहलाने के लिए काफी है। अमरवाड़ा के वार्ड नंबर चार में तो क्रूरता की हद पार हो गई, जब एक बुजुर्ग महिला के चेहरे पर कुत्तों ने हमला कर उसे बुरी तरह नोच डाला। प्रशासन का काम अब सिर्फ चेतावनी देने तक सीमित रह गया है कि “बच्चों को अकेला न छोड़ें।” आखिर क्यों? क्या शहर की सड़कें अब जनता की नहीं, इन कुत्तों की जागीर हो गई हैं?
रेबीज का मंडराता खौफ: तामिया की खौफनाक घटना
अगर समय पर एंटी-रेबीज इंजेक्शन न मिले, तो इसका अंजाम कितना भयानक हो सकता है, यह तामिया थाना क्षेत्र की घटना चीख-चीख कर बता रही है। वहां एक महिला को कुत्तों ने काटा, समय पर इलाज नहीं मिला और उसके शरीर में रेबीज का जहर फैल गया। नौबत यहां तक आ गई कि उस अभागी महिला में कुत्तों जैसे लक्षण दिखाई देने लगे। यह सिर्फ एक मेडिकल फेलियर नहीं, बल्कि इस सिस्टम के माथे पर लगा कलंक है।
वैक्सीन के भरोसे जिंदगी की भीख
आज छिंदवाड़ा जिला अस्पताल में हर महीने एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) के 900 से 1,000 डोज की जरूरत पड़ रही है। फिलहाल अस्पताल के स्टोर में 1,500 वाइल मौजूद हैं, जो बमुश्किल दो से ढाई महीने का ही बैकअप हैं।
ख़बरद्वार निष्कर्ष: वक्त आ गया है कि छिंदवाड़ा का यह सुस्त और नकारा प्रशासन अपनी नींद से जागे। जनता को कागजी आंकड़े नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए। अगर इन खूंखार आवारा कुत्तों को पकड़कर सड़कों को सुरक्षित नहीं किया गया, तो जनता का यह गुस्सा कभी भी सड़कों पर उतरकर इन निकम्मे अधिकारियों की कुर्सियां हिला सकता है।