तामिया महाफर्जीवाड़े पर विशेष रिपोर्ट — 2
छिंदवाड़ा में ‘साहब’ का साष्टांग दंडवत: जब रक्षक ही बन जाएं रसूखदारों के ‘दरबारी’, तो पातालकोट का पाताल में जाना तय है !
कहते हैं लोकतंत्र में प्रशासनिक अधिकारी (जिन्हें हम बड़े चाव से ‘पब्लिक सर्वेंट’ यानी जनता का सेवक कहते हैं) रीढ़ की हड्डी होते हैं। लेकिन छिंदवाड़ा के प्रशासनिक तंत्र को देखकर लगता है कि इन्होंने अपनी रीढ़ की हड्डी किसी कबाड़खाने में गिरवी रख दी है। जिले का प्रशासनिक ढांचा इस कदर पंगु, लाचार और रीढ़विहीन हो चुका है कि ‘साहब’ जनसेवा की कसम भूलकर, सफेदपोश नेताओं और भू-माफियाओं की चौखट पर ‘साष्टांग दंडवत’ मुद्रा में पाए जाते हैं।
तामिया के चौरा पठार (पातालकोट व्यू पॉइंट) पर आदिवासियों की करोड़ों की जमीन को ‘कौड़ियों’ के भाव अपने रिश्तेदारों के नाम लिखवाने वाले इन साहबों की हिम्मत देखकर दातों तले उंगली दबाने की जरूरत नहीं है; क्योंकि जब ‘ऊपर’ बैठे आकाओं का आशीर्वाद प्राप्त हो, तो नियम-कायदे सिर्फ कागजों पर धूल फांकने के लिए होते हैं।
राकेश प्रजापति
जनता लाइन में खड़ी है, और साहब ‘नेताओं’ की आरती उतार रहे हैं !
छिंदवाड़ा में ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल किसी मलाईदार मटके से कम नहीं है। मलाईदार कुर्सी पर टिके रहने का पहला और आखिरी नियम यही है—“जनता की चीखें भले ही आसमान छू लें, लेकिन नेताजी की चाय ठंडी नहीं होनी चाहिए।”
जब जिले के जिम्मेदार अधिकारी सुबह-शाम प्रभावशाली राजनेताओं की ड्योढ़ी पर हाजिरी लगाने को अपनी मुख्य ड्यूटी मान लें, तो पातालकोट के सीधे-साधे भारिया आदिवासियों की जमीन पर गिद्धों की नजर पड़ना स्वाभाविक है। साहबों की वफादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि उन ‘आकाओं’ के प्रति है जो इन्हें आलीशान केबिन और रसूख की गारंटी देते हैं। नतीजा ? पटवारी से लेकर कलेक्टर तक का तंत्र आदिवासियों के लिए ‘अंधा-बहरा’ हो जाता है और भू-माफियाओं के लिए ‘पलक-पावड़े’ बिछाए खड़ा रहता है।
कागजी घोड़े और ‘जांच’ का झुनझुना: जब बिल्ली को ही दूध की रखवाली सौंप दी जाए !
इस महाघोटाले के उजागर होने के बाद वर्तमान प्रशासनिक तंत्र ने अपनी पुरानी, घिसी-पिटी और सबसे महफूज तरकीब निकाली है—‘जांच के आदेश’। वाह साहब, क्या टाइमिंग है! दशकों से जिस आदिवासियों की जमीन का सीमांकन और बंटवारा करने में सरकारी कछुए को लकवा मार गया था, उसी जमीन की रजिस्ट्री साहबों की पोस्टिंग के दौरान चंद दिनों में ‘सुपरसोनिक रॉकेट’ की रफ्तार से पूरी हो गई। और अब, जब चोरी पकड़ी गई है, तो साहब कह रहे हैं—” मामला जांच में है।”
प्रशासनिक नौटंकी का व्यंग्य समझिए:
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नियम नंबर 1: अगर कोई आदिवासी अपनी जमीन बचाने के लिए दफ्तर आए, तो उसे ‘तारीख पर तारीख’ देकर चप्पलें घिसने पर मजबूर कर दो।
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नियम नंबर 2: अगर कोई रसूखदार या साहब का रिश्तेदार करोड़ों की जमीन 6 लाख में हड़पना चाहे, तो ई-केवाईसी और फर्जी पंचनामा ‘ओवरटाइम’ करके रातों-रात तैयार कर दो।
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नियम नंबर 3: जब बवाल मचे, तो ‘जांच की फाइल’ ऐसी अलमारी में डाल दो, जिसकी चाबी सिर्फ रिटायरमेंट के बाद मिले।
इस पूरे खेल में तत्कालीन कलेक्टर शिवेंद्र सिंह के कार्यकाल से लेकर अब तक की कड़ियां जोड़ी जाएं, तो साफ झलकता है कि यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह एक सुव्यवस्थित ‘सिंडिकेट’ है, जिसका काम ही आदिवासियों की जमीनों का ‘सॉफ्ट टारगेट’ बनाकर शिकार करना है।
विधानसभा में 183 मामले… पर ‘साहब’ का हाजमा दुरुस्त है !
जिले भर से आदिवासियों की जमीनों को गैर-आदिवासियों को खैरात में बांटने के 183 संदिग्ध मामले विधानसभा के पटल पर गूंज चुके हैं। आम इंसान का पेट खराब होने के लिए दो समोसे काफी हैं, लेकिन हमारे छिंदवाड़ा के प्रशासनिक तंत्र का ‘हाजमा’ देखिए—आदिवासियों की सैकड़ों एकड़ जमीनें डकारने के बाद भी इन्हें डकार तक नहीं आती।
विपक्ष चिल्लाता रहे, जनता रोती रहे, लेकिन साहब निश्चिंत हैं क्योंकि उन्हें पता है कि जब तक वे प्रभावशाली राजनेताओं की चौखट के ‘दरबारी’ बने रहेंगे, उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। विधानसभा में उठने वाले सवाल इन साहबों के लिए मनोरंजन से ज्यादा कुछ नहीं हैं, क्योंकि फाइलें तो आखिरकार इन्हीं के टेबल पर आकर दम तोड़ती हैं।
बड़ा सवाल: जनता के ‘रक्षक’ या रसूखदारों के ‘बंधुआ मजदूर’ ?
तामिया का यह जमीन घोटाला सिर्फ एक बानगी है इस बात की कि छिंदवाड़ा में नौकरशाही किस कदर पंगु हो चुकी है। जिन आदिवासियों के वोट पर सूबे की सरकारें बनती हैं, उन्हीं आदिवासियों को उनके अस्तित्व (जमीन) से बेदखल करने के लिए पूरा प्रशासनिक अमला ‘भू-माफिया का पार्टनर’ बनकर काम कर रहा है।
सांसद और विधायक अब भले ही कार्रवाई की बात कर रहे हों, लेकिन सवाल यह है कि आखिर इन अधिकारियों को इतनी शह देता कौन है? क्या कलेक्टर हरेंद्र नारायण की यह ‘जांच’ उन रसूखदार एसडीएम, बीएमओ और तहसीलदारों की अकड़ ढीली कर पाएगी, जो आज भी सीना ठोक कर कह रहे हैं कि ‘सब नियमों के तहत हुआ है’ ? या फिर यह जांच भी छिंदवाड़ा के उसी राजनैतिक-प्रशासनिक गठजोड़ के समंदर में विलीन हो जाएगी, जहां हर बड़ा घोटाला आपसी ‘सेटिंग’ की भेंट चढ़ जाता है।
पातालकोट के आदिवासियों की आंखें अब इंसाफ की उम्मीद में पथरा रही हैं, और साहब… साहब अभी भी अगली पोस्टिंग के लिए ‘चौखट’ नाप रहे हैं!