बिना चुनाव जीते BJP के 3 राज्यसभा सांसद, ‘वॉकओवर’ पर सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस ..

मध्य प्रदेश की सियासी बिसात: बिना शंखनाद के राज्यसभा फतह, भाजपा को मिला ‘वॉकओवर’

मध्य प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इस बार राज्यसभा चुनाव की जो पटकथा लिखी गई, वह किसी ‘पॉलिटिकल थ्रिलर’ से कम नहीं रही। लोकतांत्रिक अखाड़े में बिना किसी चुनावी शोर-शराबे और मतदान के ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने एकतरफा जीत का परचम लहरा दिया है। चुनाव आयोग की स्क्रूटनी के ‘फिल्टर’ ने इस मुकाबले को चुनाव से पहले ही ‘नतीजे’ में तब्दील कर दिया।

✍️ राकेश प्रजापति 

बिना रण के परिणाम: उच्च सदन के तीन नए ‘सिकंदर’

भोपाल स्थित विधानसभा परिसर में चुनावी गहमागहमी की जगह सीधे जीत के जश्न ने ले ली। निर्वाचन प्रक्रिया में नाम वापसी का समय खत्म होते ही तस्वीर आईने की तरह साफ हो गई। मैदान में केवल भाजपा के तीन वैध नामांकन शेष थे, जिसके चलते मतदान की नौबत ही नहीं आई। रिटर्निंग अधिकारी ने इन तीनों नेताओं को निर्विरोध जीत का आधिकारिक प्रमाण पत्र सौंप दिया:

  • तरुण चुघ: राष्ट्रीय स्तर के दिग्गज रणनीतिकार, जिनकी ताजपोशी उच्च सदन में भाजपा के मजबूत इरादों को दर्शाती है।

  • रजनीश अग्रवाल: प्रदेश की राजनीति और संगठन में गहरी पैठ रखने वाले नेता।

  • महेश केवट: जमीनी सामाजिक समीकरणों को साधने वाला एक अहम चेहरा।

‘तकनीकी नॉकआउट’: जहां पलटा पूरा खेल

इस पूरी राजनीतिक गाथा का सबसे दिलचस्प और विवादित अध्याय कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होना रहा। राजनीति में इसे विपक्ष के लिए एक बड़ा ‘तकनीकी नॉकआउट’ माना जा रहा है।

  • चुनौती का शून्य होना: नामांकन में तकनीकी खामी के कारण नटराजन के बाहर होते ही सत्ता पक्ष के सामने से विपक्ष की चुनौती पूरी तरह समाप्त हो गई।

  • एकतरफा मुकाबला: इस एक घटना ने उस संभावित कड़े मुकाबले को खत्म कर दिया, जो अन्यथा दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन सकता था।

राज्यसभा का नया गणित: बदलाव की बयार

यह जीत महज तीन सीटों की नहीं, बल्कि उच्च सदन (राज्यसभा) में ताकत के संतुलन को और अधिक भाजपा के पक्ष में झुकाने की है। यह निर्वाचन उन सीटों के लिए था, जिन पर मौजूदा दिग्गजों का कार्यकाल इसी माह समाप्त हो रहा है:

  • बाहर जाते चेहरे: दिग्विजय सिंह (कांग्रेस), जॉर्ज कुरियन (भाजपा) और सुमेर सिंह सोलंकी (भाजपा)।

  • बदलता समीकरण: अब इन सीटों पर नए सदस्यों के प्रवेश के साथ ही राज्यसभा में भाजपा का रणनीतिक और संख्यात्मक बल और अधिक सुदृढ़ हो गया है।

सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक: कांग्रेस का ‘कानूनी’ पलटवार

चुनावी पिच पर बिना खेले ही बाहर होने के बाद कांग्रेस अब कानूनी और संवैधानिक क्रीज पर आक्रामक रुख अपना रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में पार्टी ने इसे एक बड़ा लोकतांत्रिक मुद्दा बना लिया है:

  1. न्यायपालिका का दरवाजा: मीनाक्षी नटराजन के नामांकन निरस्तीकरण के खिलाफ कांग्रेस ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, जहां शुक्रवार को होने वाली सुनवाई पर पूरे प्रदेश की नजरें हैं।

  2. संवैधानिक गुहार: मध्य प्रदेश कांग्रेस ने इस प्रकरण पर सीधे राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग करते हुए मिलने का समय मांगा है।

  3. आर-पार की चेतावनी: जीतू पटवारी ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया है कि यदि राष्ट्रपति से समय नहीं मिलता है, तो पार्टी अपने ‘अगले कड़े रणनीतिक निर्णय’ का ऐलान करेगी।

विश्लेषणात्मक निष्कर्ष: मध्य प्रदेश का यह राज्यसभा चुनाव मतपेटियों और संख्याबल के लिए नहीं, बल्कि तकनीकी दांव-पेंच और ‘वॉकओवर’ की राजनीति के लिए याद रखा जाएगा। फिलहाल भाजपा के तीनों उम्मीदवार तकनीकी रूप से विजयी घोषित हो चुके हैं, लेकिन अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट की दहलीज और कांग्रेस के अगले कदम पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह ‘निर्विरोध जीत’ निर्विवाद रहती है या इसमें कोई नया कानूनी मोड़ आता है।