महिला पुलिसकर्मी की दर्दनाक खुदकुशी, पीछे छोड़ गई 15 साल की मासूम बेटी..

छिंदवाड़ा में झकझोर देने वाली त्रासदी: तंत्र की निष्ठुरता के आगे हार गई एक ‘खाकी’ की हिम्मत !

जब समाज की रक्षा का जिम्मा उठाने वाली ‘खाकी ‘ खुद के वजूद की लड़ाई हार जाए, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था की जड़ों में कोई गहरा घुन लग चुका है। एक ऐसी ही रूह कंपा देने वाली और हैरान कर देने वाली खबर छिंदवाड़ा के साहू मोहल्ला (वार्ड क्रमांक 47) से आ रही है, जिसने हर संवेदनशील दिल को झकझोर कर रख दिया है।

पुलिस विभाग में करीब 15 वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहीं 42 वर्षीय महिला प्रधान आरक्षक दीपा नेगी ने पेट्रोल डालकर खुद को आग के हवाले कर दिया। वह व्यवस्था, जो दूसरों को न्याय और सुरक्षा का भरोसा देती है, वो अपनी ही एक जांबाज सिपाही के भीतर सुलग रहे दर्द को भांपने में पूरी तरह नाकाम रही।

✍️ राकेश प्रजापति 

पल-पल परीक्षा लेती जिंदगी और निष्ठुर तंत्र

दीपा नेगी की कहानी सिर्फ एक महिला पुलिसकर्मी की आत्महत्या भर नहीं है, बल्कि यह इस समाज और प्रशासनिक तंत्र में एक अकेली महिला के संघर्ष की वो दास्तान है, जहां उसे हर कदम पर एक कड़ी और दर्दनाक परीक्षा देनी पड़ती है।

  • विपदाओं का पहाड़: पति के असामयिक निधन के बाद दीपा जी को अनुकंपा नियुक्ति मिली थी। जरा सोचिए, एक तरफ जीवनसाथी को खोने का असीम दुख, दूसरी तरफ पुलिस की चौबीस घंटे वाली तनावपूर्ण ड्यूटी, और इन सबके बीच अपनी 15 साल की मासूम बेटी के भविष्य को संवारने की दोहरी जिम्मेदारी।

  • बीमारी और अकेलेपन का दंश: सूत्रों के मुताबिक, वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं और नागपुर में उनका इलाज चल रहा था। लेकिन क्या हमारे पुलिस महकमे के पास अपनी ही एक बीमार, संघर्षरत महिला कर्मचारी के मानसिक और शारीरिक तनाव को बांटने के लिए कोई संवेदनशील सिस्टम नहीं था ?

एक बड़ा सवाल: क्या हम एक ऐसे संवेदनहीन तंत्र में जी रहे हैं, जहां मोर्चे पर तैनात रहने वाली एक महिला अधिकारी को भीतर से टूटते हुए देखने वाला कोई नहीं होता ? इसे व्यवस्था और तंत्र में आई गिरावट का नतीजा नहीं तो और क्या कहें, जो अपने ही महकमे के लोगों को जीने की वजह और मानसिक संबल देने में नाकाम साबित हो रहा है।

आखिरी सफर: सुबह पेट्रोल मांगा, और फिर…

इस घटनाक्रम का सबसे हैरान और विचलित कर देने वाला पहलू यह है कि दीपा जी सुबह घर से यह कहकर निकली थीं कि वे पेट्रोल लेने जा रही हैं। किसी को कानों-कान भनक तक नहीं थी कि जो पेट्रोल गाड़ियों की रफ्तार बढ़ाता है, वही आज एक मां, एक सिपाही की जिंदगी की रफ्तार को हमेशा के लिए थाम देगा। घर लौटकर उन्होंने खुद को आग के हवाले कर दिया।

पीछे छूट गई एक मासूम की सिसकियां

इस खौफनाक और दिल दहला देने वाले कदम के बाद पीछे रह गई है सिर्फ एक 15 वर्षीय मासूम बेटी, जिसके सिर से पिता का साया पहले ही उठ चुका था और अब मां का आंचल भी हमेशा के लिए छिन गया। उस बच्ची की सिसकियां आज पूरे प्रशासनिक अमले और समाज से तीखे सवाल पूछ रही हैं।

फिलहाल पुलिस विभाग और पूरे क्षेत्र में मातम पसरा हुआ है। आत्महत्या के असली कारणों की जांच की जा रही है, लेकिन कागजी जांच चाहे जो भी कहे, सच तो यही है कि एक हंसती-खेलती जिंदगी व्यवस्था की उदासीनता और कड़े संघर्षों की भेंट चढ़ गई।