मध्यप्रदेश में नारी शक्ति का अभ्युदय: दहलीज से सदन तक, सेवा से शासन तक ..
राकेश प्रजापति
भारतीय मनीषा में सदियों से एक सूक्त उद्घोषित है— ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’। लेकिन आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक परिदृश्य में यह केवल पूजा तक सीमित न रहकर ‘प्रभावी नेतृत्व’ का पर्याय बन चुका है। मध्यप्रदेश की 16वीं विधानसभा इस सत्य की जीवंत गवाह है। यहाँ 27 महिला विधायकों की उपस्थिति केवल चुनावी विजय का सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उन 27 संघर्षों की महागाथा है जिन्होंने घर की मर्यादा और सदन की गरिमा के बीच के फासले को अपनी जिजीविषा से पाट दिया है। आज मध्यप्रदेश के राजनीतिक आकाश पर ‘ममत्व’ और ‘मजबूती’ का एक ऐसा इंद्रधनुष उभरा है, जिसमें अनुभव की वरिष्ठता भी है और युवा जोश की ऊर्जा भी।
आध्यात्मिक अधिष्ठान: देवी अहिल्या और रानी दुर्गावती का पुनर्जागरण
मध्यप्रदेश की इस प्रशासनिक और राजनीतिक संरचना में नारी शक्ति का यह उभार आकस्मिक नहीं है। इसके मूल में वह आध्यात्मिक चेतना है, जो माँ अहिल्याबाई होल्कर के न्याय और रानी दुर्गावती के शौर्य से अनुप्राणित है। अध्यात्म की दृष्टि से नारी को ‘शक्ति’ का स्वरूप माना गया है—वह शक्ति जो सृजन भी करती है और दुष्ट प्रवृत्तियों का संहार भी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में वर्तमान सरकार का दृष्टिकोण इसी आध्यात्मिक आदर्श को आधुनिक सुशासन (Good Governance) से जोड़ता है। जब एक महिला कलेक्टर जिले की कमान संभालती है या एक महिला मंत्री सदन में नीतिगत निर्णय लेती है, तो वह अनजाने ही लोक-कल्याण के उसी दैवीय संकल्प को दोहरा रही होती है, जो हमारी संस्कृति का आधार रहा है।
सदन का नया स्वरूप: संघर्ष से शिखर तक
आज की मध्यप्रदेश विधानसभा में महिला शक्ति का एक अद्भुत गुलदस्ता सजा है। यहाँ सामाजिक विषमताओं को चीरकर आगे बढ़ने वाली संपतिया उइके जैसी नेत्री हैं, जिनका सफर दिहाड़ी मजदूरी से शुरू होकर कैबिनेट मंत्री की कुर्सी तक पहुँचा है। यह नेतृत्व की वह मजबूती है जो जमीन की धूल और पसीने से उपजी है।
वहीं, कृष्णा गौर की गोविंदपुरा सीट से 1.06 लाख मतों की ऐतिहासिक जीत जनता के उस अटूट विश्वास का प्रतीक है, जो उन्होंने महिला नेतृत्व पर जताया है। सदन में जहाँ निर्मला भूरिया और सुश्री मीना सिंह मांडवे जैसी अनुभवी नेत्रियाँ अपनी वरिष्ठता से सदन को मार्गदर्शित कर रही हैं, वहीं प्रियंका पैंची जैसी 31 वर्षीय युवा विधायक राजनीति के पुराने किलों को ढहाकर नए भारत की नई सोच का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। यह संगम बताता है कि अब राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट और जनसेवा का माध्यम बन गई है।
प्रशासनिक तंत्र में ‘लेडी कलेक्टर्स’ का परचम
इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि मध्यप्रदेश के 17 जिलों की कमान महिला कलेक्टरों के हाथों में है। खरगोन से लेकर ग्वालियर और सागर से लेकर सिवनी तक, प्रशासनिक तंत्र की बागडोर महिला अधिकारियों के पास होना एक बड़े सामाजिक बदलाव का संकेत है।
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पारदर्शिता और संवेदनशीलता: महिला अधिकारियों की कार्यशैली में एक स्वाभाविक शुचिता और संवेदनशीलता होती है।
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तीव्र निर्णय प्रक्रिया: मुख्यमंत्री का यह विश्वास कि महिलाएँ अधिक जिम्मेदारी और गति से कार्य करती हैं, आज धरातल पर क्रियान्वित होता दिख रहा है।
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चुनौतीपूर्ण भूमिका: चाहे वह भव्या मित्तल हों, प्रतिभा पाल हों या रुचिका चौहान, ये सभी अधिकारी कठिन भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों में शासन की योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का माध्यम बन रही हैं।
दिल्ली से भोपाल तक: सशक्त प्रतिनिधित्व
नारी शक्ति का यह विस्तार केवल प्रदेश की सीमा तक सीमित नहीं है। राज्य सभा में सुमित्रा वाल्मीकि, कविता पाटीदार और माया नारोलिया मध्यप्रदेश की गरिमा बढ़ा रही हैं, तो केंद्र सरकार में सावित्री ठाकुर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के माध्यम से देश भर की महिलाओं के हितों की रक्षा कर रही हैं। लोकसभा में लता वानखेड़े, हिमांद्री सिंह और संध्या राय की बुलंद आवाज यह सिद्ध करती है कि अब नीति निर्धारण के उच्चतम स्तरों पर महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य हो चुकी है।
भविष्य की इबारत
मध्यप्रदेश में आज जो दृश्य दिखाई दे रहा है, वह ‘आधी आबादी’ के पूरे शासन का उदय है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब महिलाओं को अवसर मिलता है, तो वे केवल अपना घर ही नहीं, बल्कि पूरा प्रदेश और राष्ट्र सँवारती हैं। 5 महिला मंत्रियों का नीतिगत कौशल और 17 महिला कलेक्टरों का प्रशासनिक अनुशासन, मध्यप्रदेश को एक ‘मॉडल स्टेट’ की ओर ले जा रहा है।
अब राजनीति और प्रशासन केवल पुरुषों के वर्चस्व वाला क्षेत्र नहीं रहा। यहाँ अब ‘बेटी’ के सपनों, ‘बहन’ के संघर्ष और ‘माँ’ के विजन से प्रदेश के स्वर्णिम भविष्य की इबारत लिखी जा रही है। यह केवल सशक्तिकरण नहीं, बल्कि एक नए युग का ‘शंखनाद’ है।
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