प्यासा शहर, लाचार सिस्टम: जब सभापति को खुद खोलना पड़ा फिल्टर प्लांट का वाल्व ..

सिस्टम की ‘सूखी’ नसों में सत्ता का अहंकार ….

✍️  संपादकीय :राकेश प्रजापति 

शहर की प्यास बुझाने का जिम्मा जिस नगर निगम पर है, वह आज खुद अपनी साख बचाने के लिए छटपटा रहा है। छिंदवाड़ा नगर निगम से आई हालिया खबरें केवल पानी की किल्लत की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह एक संस्था की आर्थिक बदहाली, प्रशासनिक लकवे और राजनैतिक खोखलेपन का जीवंत दस्तावेज हैं।

तमाशाई राजनीति और जनता की प्यास ..

जब शहर के जिम्मेदार जनप्रतिनिधि (सभापति) को खुद जाकर फिल्टर प्लांट का वाल्व खोलना पड़े, तो इसे ‘जनसेवा’ समझना भूल होगी। असल में, यह इस बात का सबूत है कि नगर निगम का प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। अधिकारी बेलगाम हैं और जनप्रतिनिधियों के बीच आपसी खींचतान इतनी गहरी है कि जनता चार दिनों तक पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसती रही। क्या एक शहर को चलाने के लिए अब ‘छापामार पद्धति’ ही एकमात्र रास्ता बचा है ?

आर्थिक बदहाली या नियत का खोट ?

खबरें स्पष्ट करती हैं कि निगम के भीतर ‘गुटबाजी’ का कैंसर फैला हुआ है। मलाईदार विभागों के बंटवारे को लेकर मची रार ने विकास कार्यों को ठप कर दिया है। एक ओर निगम अपनी आर्थिक तंगी का रोना रोता है, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की वजह से पाइपलाइनें क्षतिग्रस्त हो रही हैं। जब शहर की बुनियादी जरूरतें—जैसे पानी और सीवर—महज चुनावी रंजिश की भेंट चढ़ने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था का अंत निकट है।

राजनैतिक खोखलापन और चुनावी हिसाब ..

विडंबना देखिए, 2022 के निगम चुनावों में ‘पानी’ एक बड़ा मुद्दा था जिसने सत्ता बदली थी, लेकिन आज वही सत्ता उसी ढर्रे पर चल रही है। भाजपा और कांग्रेस के बीच चल रही इस नूराकुश्ती में आम आदमी का ‘गला’ सूख रहा है। पार्षदों का अपनी ही परिषद के खिलाफ धरने पर बैठना या ‘वार्डों के साथ भेदभाव’ का आरोप लगाना यह दर्शाता है कि नगर निगम अब जनहित की संस्था न रहकर केवल राजनैतिक अखाड़ा बन गया है।

नगर निगम की यह स्थिति डरावनी है। अगर विभाग के भीतर का समन्वय शून्य है और सत्ता के गलियारों में केवल अहंकार बोल रहा है, तो जनता को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा कि उन्होंने किसे चुना है। अधिकारियों की मनमानी और पार्षदों की गुटबाजी ने शहर को उस मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहाँ भीषण गर्मी में पानी के लिए भी ‘युद्ध’ लड़ना पड़ रहा है।

साहब ! वाल्व खोलने से प्यास नहीं बुझेगी, अपनी नियत और जर्जर हो चुके सिस्टम को सुधारने से काम बनेगा।

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