विशेष विश्लेषण : सतपुड़ा की वादियों में ‘अफीम’ का जहर – क्या खाकी की सुस्ती ने तस्करों को बनाया निडर ?
सतपुड़ा के दुर्गम और घने जंगलों में बाघों की दहाड़ के बीच जब अफीम की खुशबू महकने लगे, तो समझ लीजिए कि तंत्र की नाक के नीचे अपराध की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं। तामिया के सांगाखेड़ा रेंज से आई यह खबर केवल एक पुलिसिया दबिश नहीं, बल्कि छिंदवाड़ा जिले में नशीले काले कारोबार के बढ़ते पैर और सुरक्षा तंत्र की ‘नींद’ पर एक झन्नाटेदार तमाचा है।
राकेश प्रजापति
छिंदवाड़ा जिला अब केवल संतरों और जनजातीय संस्कृति के लिए नहीं जाना जाएगा, बल्कि अब इसकी पहचान सतपुड़ा की उन दुर्गम पहाड़ियों से भी हो रही है जहाँ ‘काला सोना’ यानी अफीम की अवैध खेती ने अपना डेरा जमा लिया है। तामिया के सांगाखेड़ा रेंज में पुलिस ने जो 6 हजार से ज्यादा अफीम के पौधे उखाड़े हैं, वे केवल पौधे नहीं बल्कि जिले के ‘खुफिया तंत्र’ की विफलता के दस्तावेज हैं।
पहाड़ियों की आड़ में पनपता ‘सफेद जहर‘
तामिया का छातीआम क्षेत्र, जहाँ पहुँचने के लिए पुलिस को डेढ़ घंटे तक पैदल पहाड़ चढ़ना पड़ा, वहां अफीम की खेती होना यह साबित करता है कि अपराधी अब शहर की गलियों से निकलकर कुदरत की गोद में छिप गए हैं। 20 लाख रुपये की अफीम का जंगल के भीतर लहलहाना कोई एक दिन की बात नहीं है। सवाल यह है कि जब यह खेती महीनों से फल-फूल रही थी, तब बीट गार्ड, वन विभाग और स्थानीय मुखबिरों की आंखें क्यों बंद थीं ?
बाघ की मौत ने खोला अफीम का राज: इत्तेफाक या बड़ी साजिश ?
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि पुलिस वहां अफीम पकड़ने नहीं, बल्कि बाघ की मौत के आरोपी की निशानदेही पर पहुंची थी। अगर बाघ की मौत न होती और आरोपी की धरपकड़ न होती, तो शायद यह 20 लाख की अफीम बाजार में बिककर हजारों युवाओं की नसों में जहर बनकर उतर जाती। क्या हमारी पुलिस और वन विभाग को अब अपराधियों के ‘इकरारनामे’ का इंतजार करना पड़ता है ? क्या बिना किसी बड़े सुराग के विभाग खुद से ऐसे संवेदनशील इलाकों की टोह लेने में असमर्थ है ?
पुलिसिया कार्यवाही पर सवालिया निशान
भले ही पुलिस अपनी पीठ थपथपा ले कि उन्होंने 194 किलो अफीम नष्ट की, लेकिन यह कार्यवाही कई गंभीर सवाल छोड़ गई है:
नेटवर्क का मास्टरमाइंड कौन ? गिरफ्तार किए गए उदेसिंग, बिसनलाल और अन्य तो केवल मोहरे हो सकते हैं। इन दुर्गम रास्तों से अफीम को बाहर ले जाने और बड़े शहरों में खपाने वाला असली ‘खिलाड़ी’ कौन है?
बढ़ता अपराध ग्राफ: छिंदवाड़ा जैसे शांत जिले में अफीम की खेती का मिलना इस बात का संकेत है कि यहां अब नार्कोटिक्स का एक समांतर साम्राज्य खड़ा हो रहा है।
प्रशासनिक तंत्र का ‘मौन’ और सक्रिय गिरोह
पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि क्या इसके पीछे कोई बड़ा गिरोह है। लेकिन हकीकत यह है कि जब तक पुलिस ‘पता’ लगाती है, तब तक ऐसे गिरोह अपनी जड़ें जमा चुके होते हैं। जिले की सरहदों और जंगलों की सुरक्षा में सेंध लग चुकी है। अफीम की खेती के लिए पानी, खाद और देखरेख की जरूरत होती है—क्या जंगल के भीतर यह सब बिना किसी ‘मिलीभगत’ के संभव है ?
अब केवल जब्ती से काम नहीं चलेगा
6 हजार पौधे उखाड़ना एक तात्कालिक सफलता हो सकती है, लेकिन छिंदवाड़ा पुलिस को अब अपनी कार्यप्रणाली में ‘प्रोएक्टिव’ होना पड़ेगा। सतपुड़ा की पहाड़ियों को अपराधियों की पनाहगाह बनने से रोकना होगा। अगर आज अफीम उग रही है, तो कल ये दुर्गम रास्ते हथियारों और अन्य अवैध गतिविधियों का अड्डा बन सकते हैं।
सीधी बात: जनता को ‘जब्ती के आंकड़ों’ से ज्यादा ‘सुरक्षा के अहसास’ की जरूरत है। क्या पुलिस उस सफेदपोश चेहरे तक पहुँच पाएगी जो इन जंगलों में अफीम का बीज बो रहा है ?
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