निष्ठा बदलने के ‘ईनाम’ की प्रतीक्षा, क्या शिवप्रकाश की बैठक में खुलेगा किस्मत का ताला ?
● 2 साल से ‘मंत्री’ पद की आस और निगम-मंडल की ‘लालसा’ में पलकें बिछाए बैठे हैं अमरवाड़ा विधायक और दीपक सक्सेना
टिप्पणी : राकेश प्रजापति
भोपाल/छिंदवाड़ा// मध्यप्रदेश भाजपा संगठन और सरकार के लिए निगम-मंडलों की नियुक्ति भले ही ‘टेढ़ी खीर’ साबित हो रही हो, लेकिन छिंदवाड़ा के उन कद्दावर नेताओं के लिए यह अब प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है, जिन्होंने सत्ता में भागीदारी की उम्मीद में अपना पुराना ‘राजनीतिक घर’ (कांग्रेस) छोड़ दिया था। खबर है कि अगले सप्ताह राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश भोपाल प्रवास पर आ रहे हैं और निगम-मंडलों की नियुक्तियों पर अंतिम मुहर लग सकती है। अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या इस बहुप्रतीक्षित सूची में छिंदवाड़ा के उन नेताओं को स्थान मिलेगा जो पिछले लंबे समय से अपने ‘राजनीतिक पुनर्वास’ की बाट जोह रहे हैं ?
इतिहास का वह ‘निर्णायक मोड़’ और 2024 के परिणाम छिंदवाड़ा के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 2024 हमेशा उस ‘निर्णायक अध्याय’ के रूप में याद किया जाएगा, जब कांग्रेस का अभेद्य माना जाने वाला किला ढह गया और कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ को पराजय का स्वाद चखना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘घर का भेदी लंका ढाए’ की तर्ज पर यह परिणाम उन रणनीतिकारों के पाला बदलने के कारण आया, जो कभी कमलनाथ के बेहद करीबी माने जाते थे। अमरवाड़ा विधायक कुंवर कमलेश शाह और पूर्व कैबिनेट मंत्री दीपक सक्सेना ने ऐन चुनाव के वक्त जो निर्णय लिया, उसने न केवल राजनीतिक समीकरण बदले, बल्कि छिंदवाड़ा की परंपरागत राजनीति की दिशा भी मोड़ दी।
वादे ‘सम्मान’ के, पर अभी तक ‘खाली हाथ’ भाजपा में शामिल होते समय इन नेताओं के मन में यह विश्वास था कि कांग्रेस के डूबते जहाज से निकलकर सत्ताधारी दल में आने पर उन्हें उचित सम्मान और पद मिलेगा। यह उम्मीद की जा रही थी कि मंत्री पद और निगम-मंडल का ताज उनके सिर सजेगा। लेकिन, वर्तमान हकीकत ‘दिल्ली अभी दूर है’ जैसी प्रतीत होती है। मप्र की भाजपा सरकार को बने लंबा समय बीत चुका है।
अमरवाड़ा विधायक कमलेश शाह आज भी उम्मीद भरी नजरों से उस अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब उन्हें मंत्री पद की शपथ का बुलावा आएगा। वहीं, दूसरी ओर दीपक सक्सेना की स्थिति भी ‘अधर में लटकी’ हुई है। निगम या मंडल अध्यक्ष बनने की उनकी महत्वाकांक्षाएं अभी तक परवान नहीं चढ़ पाई हैं। वे लगातार प्रयासरत हैं, लेकिन भाजपा के मूल कडर और संगठन के बीच सामंजस्य बिठाना उनके लिए ‘लोहे के चने चबाने’ जैसा साबित हो रहा है।
क्या बन गई है ‘त्रिशंकु’ जैसी स्थिति ? भाजपा में शामिल होते वक्त इन नेताओं को लगा था कि वे ‘किंगमेकर’ की भूमिका में होंगे, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में वे कतार में खड़े उन दावेदारों की तरह हो गए हैं जिन्हें अपनी बारी का इंतजार है। भाजपा के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए इन्हें सहजता से स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है, जिससे ‘एक म्यान में दो तलवारें’ जैसी स्थिति बन रही है। निगम-मंडल अध्यक्षों की घोषणा में हो रही लगातार देरी से इनकी बेचैनी बढ़ रही है। ये ‘चातक’ की तरह उस पल का इंतजार कर रहे हैं जब शिवप्रकाश की कलम से इनका नाम निकले और इनकी वर्षों पुरानी ‘सत्ता की प्यास’ बुझ सके।
फैसला या फिर कोरा आश्वासन ? भोपाल के गलियारों से खबर है कि दावोस से सीएम के लौटने के बाद करीब 35 नेताओं की सूची फाइनल होगी। अब देखना दिलचस्प होगा कि छिंदवाड़ा के इन दल-बदलू नेताओं को भाजपा संगठन ‘सम्मानजनक पद’ देकर उपकृत करता है, या फिर इन्हें अभी और इंतजार करना पड़ेगा। फिलहाल तो इन नेताओं की स्थिति उस मुसाफिर जैसी है, जिसने एक उम्मीद में अपना पुराना आशियाना छोड़ दिया और अब नए घर में स्थाई ठिकाने के लिए मकान-मालिक की रजामंदी पर निर्भर है। अब देखना यह है कि ऊंट किस करवट बैठता है।