बाघ के हमले से किसान की मौत: पेंच टाइगर रिजर्व के बफर जोन में दहशत

पेंच के बफर जोन में खौफ का साया: खेत में सिंचाई कर रहे किसान पर बाघ का हमला, मौके पर दर्दनाक मौत

गुमतरा (छिंदवाड़ा)/ प्रकृति के सानिध्य में बसा पेंच टाइगर रिजर्व का बफर जोन शुक्रवार की रात इंसानी खून से लाल हो गया। पेट की आग बुझाने के लिए रात के अंधेरे में खेतों को पानी देने गए एक किसान को क्या पता था कि वह मौत के मुहाने पर खड़ा है। गुमतरा गांव में बाघ के हमले से हुई एक युवा किसान की मौत ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया है, बल्कि पूरे इलाके में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है।

✍️ त्वरित टिप्पणी: राकेश प्रजापति

अंधेरे में खूनी संघर्ष: क्या हुआ उस रात ? घटना छिंदवाड़ा क्षेत्र अंतर्गत कुंभपानी वन परिक्षेत्र के बीट गुमतरा की है। जानकारी के अनुसार, शुक्रवार-शनिवार की दरम्यानी रात करीब 11:30 बजे गुमतरा निवासी राजकुमार कहार (38 वर्ष), पिता सीताराम कहार, अपने खेत में सिंचाई करने के लिए घर से अकेले निकले थे। लालमाटी क्षेत्र के कक्ष क्रमांक पी.एफ.-1409 के पास बैठे एक बाघ ने उन पर अचानक हमला बोल दिया। संघर्ष के दौरान बाघ ने राजकुमार के सिर पर गंभीर वार किए, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

मातम में बदली सुबह, छोटे भाई ने दी सूचना जब राजकुमार घर नहीं लौटे, तो परिजनों की चिंता बढ़ी। मृतक के छोटे भाई राजेश कहार ने पेंच टाइगर रिजर्व को सूचना दी कि उन्होंने घटनास्थल के पास बाघ को देखा है और वहां बाघ के पगमार्क (पंजों के निशान) मिले हैं। सूचना मिलते ही वन विभाग और पुलिस थाना बिछुआ की टीम मौके पर पहुंची। घटनास्थल का दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला था। वन अमले ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल बिछुआ भिजवाया। इस दौरान एसडीओ अतुल पारधी, गुमतरा रेंजर बलवंत सिंह कैशवाल, थाना प्रभारी सतीश उइके और वनरक्षक इनायत अली मौके पर मौजूद रहे।

प्रशासन की संवेदनशीलता और तत्काल मदद घटना की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने तत्काल संवेदनशीलता दिखाई। टाइगर रिजर्व प्रबंधन की ओर से मृतक के छोटे भाई को शासन के नियमानुसार तत्काल सहायता राशि का चेक प्रदान किया गया। यह राशि उस परिवार के आंसुओं को तो नहीं पोंछ सकती, लेकिन दुख की इस घड़ी में एक छोटा सा सहारा जरूर है।

गांवों में दहशत और मुनादी इस घटना के बाद से गुमतरा और आसपास के गांवों में सन्नाटा और भय व्याप्त है। वन विभाग ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है और बाघ की लोकेशन ट्रेस (Trace) की जा रही है। ग्रामीणों से अपील की गई है कि वे रात के समय जंगल या बफर क्षेत्र की ओर न जाएं और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत विभाग को दें।

संपादकीय दृष्टिकोण“रोजी-रोटी और जिंदगी के बीच झूलता किसान”

पेंच के बफर जोन में किसान राजकुमार कहार की मौत महज एक हादसा नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण और मानवीय अस्तित्व के बीच चल रहे द्वंद्व का एक खौफनाक अध्याय है। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे अन्नदाता किन विषम परिस्थितियों में काम करते हैं।

एक तरफ वन्यजीवों का संरक्षण जरूरी है, तो दूसरी तरफ उन ग्रामीणों की सुरक्षा भी अनिवार्य है जो पीढ़ियों से इन जंगलों के किनारे बसकर खेती कर रहे हैं। सवाल यह है कि किसान रात में खेत पर क्यों गया? जवाब कड़वा है—बिजली और पानी की उपलब्धता अक्सर उन्हें रात में जागने पर मजबूर करती है। यदि किसानों को दिन में पर्याप्त बिजली और सिंचाई की सुविधा मिले, तो शायद उन्हें रात के अंधेरे में मौत के मुंह में न जाना पड़े।

प्रशासन द्वारा त्वरित मुआवजा देना सराहनीय है, लेकिन यह स्थाई समाधान नहीं है। हमें ‘को-एक्जिस्टेंस’ (सह-अस्तित्व) के ऐसे मॉडल की जरूरत है जहाँ बाघ भी सुरक्षित रहें और इंसान भी। जब तक बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा के कड़े इंतजाम नहीं होंगे, तब तक बफर जोन में ऐसी दुखद खबरें आती रहेंगी। आज जरूरत सिर्फ मुआवजे की नहीं, बल्कि ठोस निवारण की है।