माँ ने मासूम का गला घोंटा, ” माँ, मेरा क्या कसूर ?”

रक्त रंजित हुई ममता ! जिस माँ के सीने से लगकर सुकून मिलता था, उसी ने घोंट दिया ढाई साल की मासूम का गला

यह खबर मात्र एक अपराध की रिपोर्ट नहीं, बल्कि ममता के पवित्र आँचल पर लगे उस दाग की दास्तां है जिसे शायद वक्त की बारिश भी न धो पाए। यह घटना रूह को कंपा देने वाली है, जहाँ ‘जननी’ ही ‘हंत्यारिन’ बन गई।

✍️  त्वरित टिप्पणी : राकेश प्रजापति 

चांद/छिंदवाड़ा// दुनिया में ‘माँ’ शब्द को ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है। कहा जाता है कि जब भगवान हर जगह नहीं पहुंच सके, तो उन्होंने माँ बनाई। लेकिन छिंदवाड़ा के चांद थाना क्षेत्र के ग्राम परसगांव में 10 जनवरी को जो हुआ, उसने इस पवित्र रिश्ते की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। यहाँ एक माँ का हृदय पत्थर का हो गया और उसने अपनी ही कोख से जन्मी नन्हीं कली को कुचल डाला।

वो काली तारीख: 10 जनवरी

ढाई साल की मासूम मंजीता चौरिया, जिसे अभी दुनिया की समझ भी नहीं थी, जो अपनी तोतली जुबान में शायद ‘माँ’ ही पुकार रही होगी, उसे क्या पता था कि उसकी रक्षक ही उसकी भक्षक बन जाएगी। प्रार्थी रामदास चौरिया (पिता) ने थाने में रिपोर्ट लिखवाई कि उनकी बेटी की अज्ञात कारणों से मौत हो गई है। घर में मातम पसरा था, लेकिन उस मातम के पीछे एक घिनौना सच छिपा था, जो पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ने उगल दिया।

साजिश का पर्दाफाश: ‘मफलर’ बना फंदा

पुलिस ने जब मामले की तफ्तीश शुरू की और साक्ष्य जुटाए, तो सुई किसी बाहरी दुश्मन पर नहीं, बल्कि घर के भीतर मौजूद माँ संगीता चौरिया पर ही आकर रुकी। सख्ती से पूछताछ करने पर जो सच सामने आया, उसने पुलिसवालों के भी रोंगटे खड़े कर दिए। संगीता ने कबूला कि—

“बच्ची मुझे बहुत परेशान कर रही थी। मैं डिप्रेशन (टेंशन) में थी और मुझे इतना गुस्सा आया कि मैंने उसे कान में बांधने वाले रुमाल (मफलर) से गला घोंट दिया और फिर अपने हाथों से उसका गला तब तक दबाए रखा जब तक उसकी सांसें नहीं थम गईं।”

सोचिए, उस वक्त मंजीता की आँखों में कितना भय रहा होगा? जिन हाथों ने उसे पहली बार गोद में उठाया था, वही हाथ उसके गले पर कसते चले गए।

कानूनी कार्रवाई

पुलिस ने इस वीभत्स कृत्य के लिए आरोपी माँ को गिरफ्तार कर लिया है। दिनांक 13.01.2026 को अपराध क्रमांक 14/2026, धारा 103(1) बीएनएस (भारतीय न्याय संहिता) के तहत मामला दर्ज कर उसे न्यायालय में पेश किया गया, जहाँ से उसे जिला जेल भेज दिया गया है।

 जब ममता ‘कुमाता’ बन जाए…

यह घटना समाज के माथे पर एक गहरा कलंक है। एक अबोध बच्ची, जिसका कोई दोष नहीं था सिवाय इसके कि वह अपनी माँ का ध्यान चाहती थी, उसे मौत की नींद सुला दिया गया। क्या तनाव (टेंशन) इतना बड़ा हो सकता है कि वह नौ महीने कोख में रखने वाली ममता को निगल जाए ? यह सवाल हम सभी को अंदर तक झकझोर रहा है। मंजीता को तो जमाने भर का लाड़-दुलार मिलना था, उसे खेलना था, स्कूल जाना था… लेकिन उसे नसीब हुई तो सिर्फ अपनी ही माँ के हाथों मिली मौत।

यह घटना चीख-चीख कर कह रही है कि हम मानसिक रूप से कितने खोखले होते जा रहे हैं। वह बच्ची, जो अपनी माँ को अपनी दुनिया मानती थी, आखिरी पल में उसकी आँखों में सवाल तैर रहे होंगे— “माँ, मेरा क्या कसूर ?”

मंजीता अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी खामोश चीखें हर संवेदनशील इंसान के कानों में गूंजती रहेंगी। यह सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि विश्वास, प्रेम और मातृत्व की हत्या है।