‘गीता ज्ञान प्रभा ‘ धारावाहिक 91..

मध्य प्रदेश के नरसिंगपुर जिले की माटी के मूर्धन्य साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर रमेश कुमार बुधौलिया जी द्वारा रचित ‘गीताज्ञानप्रभा’ ग्रंथ एक अमूल्य ,धार्मिक साहित्यिक धरोहर है, जिसमे डॉक्टर साहब द्वारा ज्ञानेश्वरीजी महाराज रचित ज्ञानेश्वरी गीता का भावानुवाद किया है, श्रीमद्भगवतगीता के 700 संस्कृत श्लोकों को गीता ज्ञान प्रभा में 2868 विलक्ष्ण छंदों में समेटा गया है।
उन्ही के द्वारा श्रीमद्भगवतगीता महाकाव्य की छंदोंमयी श्रंखला ‘गीता ज्ञान प्रभा ‘धारावाहिक की 91 वी कड़ी ..

                               अष्टमोऽध्यायः – ‘अक्षर ब्रह्मयोग’

  अध्याय आठ – ‘भगवतप्राप्ति योग’ या विश्व के विकास का क्रम और भगवत प्राप्ति “

श्लोक  (१८)

होती प्रगट वस्तुऐं सारी दिन का आगम होने पर

अरु विलीन हो जाती हैं वे, सभी रात्रि के आगम पर ।

तत्व रहा अव्यक्त जहाँ से, आकार प्रकट हुआ करती,

नाम दूसरा प्रकृति उसी का जहाँ विलीन हुआ करती ।

 

मूल प्रकृति के सूक्ष्म और स्थूल रुप दो कहे गये,

परा प्रकृति है कारणकारी, अपरा के बहु भेद रहे ।

प्रकृति पुरुष से हुई सचेतन और नहीं तो निष्क्रीय है,

अपरा परा प्रकृति दोनों का ही, चेतनता में लय है।

 

माया से उत्पन्न विश्व यह माया में ही लीन रहे,

ब्रह्मा का जब दिवस उदित हो तब यह दिन के साथ जगे।

चार पहर दिन के बीते तो, यह समाप्त फिर हो जाता,

आती भोर नई तो यह फिर नये सिरे से बस जाता ।

 

होता है उत्पन्न दिवा में, और रात्रि में लय होता,

बादल ज्यों नभ में आ जाता, नभ में ही विलीन होता ।

पंच महाभूतादिक ब्रम्हा की आज्ञा पालन करते,

जीवन जगत रचा दते हैं, या विलीन उसको करते

 

रहा बीज भाण्डार सृष्टि का, ब्रह्मदेव के हाथों में,

फिर भी उनका जीवन, सीमित रहता सीमित साँसों में ।

सूक्ष्म अंश जो रहा प्रकृति का, जग उसमें लवलीन रहे,

भासमान हो जगत प्रकृति जब, अपरा दिन में रुप धरे ।

 

आता है जब ब्रह्मा का दिन, यह जीव समूह प्रकट होता,

अव्यक्त जहाँ से आता यह, अवयक्त जहाँ पर यह खोता ।

आती जब रात्रि विधाता की, लय होता जीव समूह सभी,

दिन में जो प्राप्त कलेवर थे, जब हुई रात वे छिपे सभी ।

श्लोक  (१९)

यह जीव समूह वही रहता, फिर फिर दिन में दिखलाई दे,

जब आए रात छिपे फिर फिर, दिन में फिर वही दिखाई दे ।

होकर विलीन अव्यक्त रहे, कोटिक वर्षो का अन्तराल,

कर्मानुसार हो व्यक्त पुनः फिर अपना पृथक शरीर धार ।

 

जड़-जंगम भूत-सृष्टि सारी, प्रत्यक्ष दीखती जो अर्जुन,

हो रहे लीन जब रात्रि रहे, जब दिन हो रुप करे धारण ।

अव्यक्त भाव में जीवों की, सत्ता वैसी ही रहती है,

मिलती है उनको मुक्ति नहीं, कर्मो की गति न बदलती है ।

 

कल्पान्तर से जो बार-बार, जग बनता मिटता आया है,

यह मूल रुप में वही पार्थ, यह नहीं बदलने पाया है ।

उत्पन्न हुआ, फिर लीन हुआ, यह क्रम युग युग चलता आया,

ब्रह्मा के लीन हुए पर भी, यह प्रकृति साथ पलता आया ।

 

प्राणी स्वभाव के पराधीन, लेते हैं जन्म मरा करते,

गुण-कर्म रहे जिनके जैसे, सुख-दुख वैसे भोगा करते ।

अस्तित्वमान जग जीवों का मानो यह है सोना जगना,

स्वामी अप्रभावित रहता है, चलता उसका जीना मरना ।

 

ब्रह्मा की रात्रि शुरु होने पर, जहां लीन हो सकल भूत,

दिन होने पर हो जाते हो, फिर प्रकट लीन वे सकल भूत।

अव्यक्त जहां से जग जगता, अव्यक्त जहां यह जग लय है,

क्या वहीं श्रेष्ठतम है केशव या उससे भी बढ़कर कुछ है ? क्रमशः…